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दिल्ली में प्रदूषण का मुख्य कारण: बढ़ते वाहन

दिल्ली में प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जिसका मुख्य कारण सड़कों पर बढ़ती वाहनों की संख्या है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की नई रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि वाहन उत्सर्जन पीएम 2.5 के उच्च स्तर के लिए जिम्मेदार है। एनसीआर में भी प्रदूषण की स्थिति चिंताजनक है, जहां कई क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता बिगड़ रही है। रिपोर्ट में पराली जलाने के प्रभाव को लेकर भी नए निष्कर्ष सामने आए हैं। जानें इस समस्या के पीछे के कारण और इसके समाधान के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
 

सीएसई की नई रिपोर्ट में खुलासा


नई दिल्ली: दिल्ली में प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुकी है। सरकार के प्रयासों के बावजूद, यह समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। हाल ही में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) द्वारा जारी एक अध्ययन में यह बताया गया है कि दिल्ली में प्रदूषण का मुख्य कारण सड़कों पर बढ़ती वाहनों की संख्या है।


रिपोर्ट में यह बताया गया है कि पीएम 2.5 के उच्च स्तर के लिए वाहन उत्सर्जन सबसे बड़ा कारक है। एनसीआर में एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशनों से प्राप्त रियल-टाइम डेटा के अनुसार, दिल्ली के स्थानीय प्रदूषण में लगभग 50% योगदान केवल वाहनों से आता है।


एनसीआर में प्रदूषण की स्थिति

दिसंबर में पीएम 2.5 के स्तर में सबसे अधिक वृद्धि नोएडा में देखी गई, जहां 38% की बढ़ोतरी हुई। इसके बाद बल्लभगढ़ में 32%, बागपत में 31% और दिल्ली में 29% की वृद्धि हुई। यह स्थिति दिखाती है कि एनसीआर के कई क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता बिगड़ रही है।


सीएसई की रिपोर्ट के नए निष्कर्ष

पराली जलाने को अब तक प्रदूषण का मुख्य कारण माना जाता रहा है, लेकिन सीएसई की नई रिपोर्ट ने इस धारणा को चुनौती दी है। अध्ययन में पाया गया कि पराली जलाने का प्रभाव खत्म होने के बाद भी दिसंबर में पीएम 2.5 का स्तर बढ़ा।


अक्टूबर और नवंबर को 'अर्ली विंटर' माना गया है, जबकि दिसंबर को 'पोस्ट-फार्म फायर' चरण के रूप में देखा गया है।


दिसंबर में प्रदूषण की गंभीरता

रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर में एनसीआर में फैला स्मॉग न केवल व्यापक था, बल्कि यह पराली जलाने के महीनों की तुलना में अधिक गंभीर था। 1 से 15 दिसंबर के बीच, दिल्ली का योगदान कुल पीएम 2.5 में केवल 35% रहा, जबकि 65% प्रदूषण आसपास के क्षेत्रों से आया।


पराली जलाने का प्रभाव

सीएसई ने पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण के योगदान का आकलन करने के लिए पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के डेटा का उपयोग किया। यह स्पष्ट हुआ कि पराली का प्रभाव सीमित समय तक रहता है, जबकि सर्दियों में वाहन और अन्य स्थानीय स्रोत लंबे समय तक प्रदूषण को बनाए रखते हैं।