दिल्ली में विरोध स्थलों का परिवर्तन: क्या प्रदर्शन संसद से दूर हो रहे हैं?
विरोध प्रदर्शन का महत्व
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जिसके जरिए जनता अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाती है। समाजवादी विचारक और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि जब सड़कें सुनसान हो जाती हैं, तो संसद की गतिविधियाँ भी प्रभावित होती हैं। भारतीय लोकतंत्र में, संसद के पास लंबे समय से प्रदर्शन होते आ रहे हैं, और इन प्रदर्शनों की आवाज संसद के गलियारों तक पहुंचती रही है। पहले, प्रदर्शन बोट क्लब के क्षेत्र में होते थे, लेकिन 90 के दशक में यह स्थान जंतर-मंतर में स्थानांतरित कर दिया गया। अब, जंतर-मंतर भी प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर हो चुका है।
प्रदर्शन स्थलों का इतिहास
दिल्ली में बोट क्लब लंबे समय तक बड़े जन आंदोलनों का केंद्र रहा है। यह स्थान इंडिया गेट के निकट और संसद तथा केंद्र सरकार के कार्यालयों के पास स्थित है। यहां प्रदर्शन करने का अर्थ था कि आंदोलन की आवाज सीधे सत्ता के गलियारों तक पहुंचती थी। अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में एक विशाल किसान आंदोलन भी इसी क्षेत्र में हुआ था। हजारों किसान अपनी मांगों के साथ बोट क्लब में एकत्र हुए और कई दिनों तक वहां डटे रहे। इस आंदोलन ने तत्कालीन राजीव गांधी सरकार का ध्यान आकर्षित किया।
जंतर-मंतर का उदय
बोट क्लब पर पाबंदियों के बाद, जंतर-मंतर प्रदर्शनकारियों के लिए एक प्रमुख स्थल बन गया। यह संसद से निकटता के कारण भीड़ को नियंत्रित करना और ट्रैफिक को संभालना आसान था। धीरे-धीरे, यह जगह धरनों और भूख हड़तालों का जाना-पहचाना ठिकाना बन गई। अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन और 2023 में पहलवानों का प्रदर्शन जैसे आंदोलनों ने जंतर-मंतर को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। हालांकि, इस क्षेत्र में प्रदर्शन को लेकर कई बार सवाल उठते रहे हैं।
क्या प्रदर्शन स्थलों की दूरी बढ़ रही है?
बोट क्लब और जंतर-मंतर, दोनों ही संसद से निकटता में थे, लेकिन अब नए निर्धारित स्थलों की दूरी बढ़ गई है। रामलीला मैदान संसद से लगभग 4 से 5 किलोमीटर, पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड करीब 14 किलोमीटर और बुराड़ी मैदान लगभग 23 किलोमीटर दूर है। यह स्पष्ट है कि प्रदर्शन स्थलों की दूरी धीरे-धीरे संसद से बढ़ती जा रही है।