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दिल्ली सरकार की नई ईवी नीति: कार मालिकों के लिए सब्सिडी पर सवाल

दिल्ली सरकार की नई इलेक्ट्रिक वाहन नीति प्रदूषण को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसके वित्तीय बोझ पर सवाल उठ रहे हैं। इस नीति के तहत कार मालिकों को दी जाने वाली सब्सिडी और उसके संभावित प्रभावों पर चर्चा की गई है। क्या यह नीति आम करदाताओं के लिए उचित है? जानें इस लेख में।
 

दिल्ली की इलेक्ट्रिक वाहन नीति पर विचार


दिल्ली सरकार की नई इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) नीति एक सकारात्मक कदम है, जो राष्ट्रीय राजधानी को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में सहायक हो सकती है। हालांकि, इस नीति का वित्तीय बोझ आम करदाताओं पर डालना उचित नहीं है। उपभोक्ताओं को ईवी की ओर आकर्षित करने के लिए 30 लाख रुपये तक की कारों पर रोड टैक्स और पंजीकरण शुल्क में पूरी छूट दी गई है। इसके साथ ही, प्रदूषणकारी वाहनों को हटाने के लिए बीएस-4 या उससे पुराने चार पहिया वाहनों के लिए एक लाख रुपये तक का स्क्रैपेज इंसेंटिव भी दिया जाएगा। अगले चार वर्षों में, दिल्ली सरकार इस सब्सिडी और ईवी चार्जिंग स्टेशनों पर 15,000 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बना रही है।


यह स्पष्ट है कि यह खर्च उन नागरिकों की कीमत पर होगा, जो कार रखने का सपना भी नहीं देख सकते। एक ऐसे देश में, जहां कार स्वामित्व कुल आबादी में आठ प्रतिशत से कम है, वहां कार मालिकों को इतनी बड़ी सब्सिडी देना उचित नहीं है। बेहतर दृष्टिकोण यह हो सकता था कि डीजल या पेट्रोल कारों को महंगा बनाया जाए। उदाहरण के लिए, कार मालिकों को ईवी की तुलना में दो या तीन गुना अधिक रोड टैक्स और पंजीकरण शुल्क देना पड़ सकता था।


इससे सरकार को अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होता, जिसका उपयोग सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था को सुधारने में किया जा सकता था। हालांकि, अब यह चिंता है कि ईवी को प्राथमिकता देने के निर्णय का असर सार्वजनिक कल्याण और गरीब तबकों को बुनियादी सुविधाएं देने के बजट पर पड़ेगा। दिल्ली सरकार ने एक जनवरी 2027 से केवल इलेक्ट्रिक थ्री-ह्वीलर्स (ई-ऑटो) का पंजीकरण करने और एक अप्रैल 2028 से पेट्रोल-सीएनजी दोपहिया वाहनों का पंजीकरण पूरी तरह से बंद करने का निर्णय लिया है। ये कदम सही दिशा में हैं।