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दिल्ली हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: महिला के पहनावे को अपराध से नहीं जोड़ा जा सकता

दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी महिला के पहनावे को उसके चरित्र पर सवाल उठाने के लिए नहीं लिया जा सकता। न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने स्पष्ट किया कि महिला की पहनावे की पसंद उसकी गरिमा को कम नहीं करती। अदालत ने जींस पहनने वाली महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह को अस्वीकार किया और कहा कि बच्चों को अनुशासन सिखाना अभिभावकों की जिम्मेदारी है। इस फैसले में न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़ितों के लिए मानसिक आघात को रोकने पर भी जोर दिया गया है।
 

महिला के पहनावे पर सवाल उठाने का फैसला


दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी महिला के कपड़ों को उसके चरित्र पर सवाल उठाने या उसके खिलाफ किसी अपराध को सही ठहराने के लिए नहीं लिया जा सकता। न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने स्पष्ट किया कि महिला की पहनावे की पसंद उसकी गरिमा को कम नहीं करती और न ही यह किसी अवैध कार्य का औचित्य प्रदान कर सकती है।


जींस पहनने वाली सोच पर सवाल

अदालत ने 50 पन्नों के अपने फैसले में कहा कि किसी लड़की या महिला का पहनावा उसका व्यक्तिगत निर्णय है। न्यायालय ने उस मानसिकता को चिंताजनक और अस्वीकार्य बताया, जिसमें यह माना जाता है कि जींस पहनने वाली महिलाएं आसपास के युवा लड़कों को 'बिगाड़' सकती हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों को अनुशासन और दूसरों का सम्मान सिखाना समाज और अभिभावकों की जिम्मेदारी है।


पीड़िता के पहनावे पर सवाल उठाना

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने पीड़िता के कपड़ों और उसके पश्चिमी पहनावे पर सवाल उठाए। स्थानीय लोगों द्वारा उसके पहनावे पर आपत्ति जताने का मुद्दा भी अदालत के समक्ष आया। उच्च न्यायालय ने इस तरह की पूछताछ को मामले से असंबंधित बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य पीड़िता को शर्मिंदा करना और नैतिक रूप से जज करना प्रतीत होता है।


ट्रायल कोर्ट का निर्णय पलटा

यह मामला जुलाई 2013 में एक 17 वर्षीय लड़की द्वारा आरोपी पर यौन टिप्पणियां करने और उसके गाल व कूल्हे को छूने के आरोप से संबंधित था। ट्रायल कोर्ट ने अगस्त 2014 में आरोपी को बरी कर दिया था। राज्य की अपील पर उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों की पुनरावलोकन की और ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष से असहमति जताई।


धर्म और परंपरा का मुद्दा

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि पीड़िता के धर्म या क्षेत्र की सामाजिक परंपराओं को मामले में लाने का कोई औचित्य नहीं था। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता और POCSO कानून सभी पर समान रूप से लागू होते हैं। किसी धर्म या स्थानीय प्रथा के आधार पर महिला के व्यक्तिगत निर्णयों पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।


जिरह के दौरान अपमान की अनुमति नहीं

न्यायमूर्ति सुधा ने कहा कि आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का पूरा अधिकार है, लेकिन इसका उपयोग किसी गवाह को अपमानित या शर्मिंदा करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब जिरह प्रासंगिकता और मर्यादा की सीमा पार करे, तो न्यायाधीश को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। गवाह की गरिमा को उसकी विश्वसनीयता परखने के नाम पर बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।


पीड़ितों के लिए न्यायिक प्रक्रिया का महत्व

फैसले में अदालत ने न्यायिक अधिकारियों की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया। अदालत ने कहा कि न्याय प्रक्रिया पीड़ित या गवाह के लिए दोबारा मानसिक आघात का कारण नहीं बननी चाहिए। महिला के कपड़ों, चरित्र, जीवनशैली, धर्म या व्यक्तिगत पसंद से जुड़े सवाल तभी पूछे जाने चाहिए जब वे मामले के किसी वास्तविक और प्रासंगिक मुद्दे से सीधे जुड़े हों।