द्वारका: भगवान कृष्ण की पवित्र नगरी का इतिहास और अंत
द्वारका का महत्व
देवभूमि द्वारका। यह नगर गुजरात के द्वारका जिले में स्थित है और इसे हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। यह चार धामों में से एक है और सात पुरियों में से एक पुरी है। यह समुद्र के किनारे बसा हुआ है और हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान कृष्ण ने इसे बसाया था।
भगवान कृष्ण का द्वारका में आगमन
गुजरात का द्वारका वह स्थान है जहां भगवान कृष्ण ने लगभग 5000 वर्ष पूर्व मथुरा छोड़कर एक नई नगरी बसाई थी। उनके निजी महल 'हरि गृह' के स्थान पर आज द्वारकाधीश मंदिर स्थित है, जो कृष्ण भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। द्वारका नगरी आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार धामों में से एक है और इसे पवित्र सप्तपुरियों में भी शामिल किया गया है।
द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास
ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण भगवान कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने करवाया था। समय के साथ, मंदिर का विस्तार और जीर्णोद्धार होता रहा, और इसे 16वीं शताब्दी में वर्तमान स्वरूप मिला। द्वारकाधीश मंदिर के पास रुक्मिणी का मंदिर भी है, जो एकांत में स्थित है।
द्वारका का अंत
कब, क्यों और कैसे डूबी द्वारका?
महाभारत युद्ध के 36 वर्ष बाद, द्वारका समुद्र में डूब गई। इसके पीछे माता गांधारी द्वारा दिया गया श्राप और ऋषियों द्वारा श्री कृष्ण के पुत्र सांब को दिया गया श्राप मुख्य कारण थे।
गांधारी का श्राप
महाभारत युद्ध के बाद, गांधारी ने श्री कृष्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार कौरवों का नाश हुआ, उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा।
ऋषियों का श्राप
ऋषियों ने सांब को श्राप दिया कि वह एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिससे यदुवंश का नाश होगा। इस श्राप के प्रभाव से द्वारका में भयंकर अपशकुन होने लगे।
यदुवंशियों का अंत
जब श्री कृष्ण ने देखा कि यदुवंशियों में आपसी संघर्ष हो रहा है, तो उन्होंने तीर्थयात्रा करने का आदेश दिया। इस दौरान, यदुवंशियों के बीच लड़ाई हुई और अंततः सभी का नाश हो गया।
श्री कृष्ण का देह त्याग
श्री कृष्ण ने अपने इंद्रियों का संयमित किया और समाधि में लीन हो गए। एक शिकारी ने उन्हें गलती से मारा, जिसके बाद श्री कृष्ण ने अपने परमधाम को प्रस्थान किया।
अर्जुन का द्वारका आगमन
दारुक ने हस्तिनापुर जाकर यदुवंशियों के संहार की घटना बताई। अर्जुन ने द्वारका पहुंचकर वहां के दृश्य को देखकर शोक व्यक्त किया और श्री कृष्ण के परिजनों को इंद्रप्रस्थ ले जाने का निर्णय लिया।
द्वारका का समुद्र में विलीन होना
अर्जुन ने सभी नगरवासियों को इंद्रप्रस्थ ले जाने की तैयारी की। जैसे ही वे वहां से चले गए, द्वारका समुद्र में डूब गई। यह दृश्य सभी के लिए आश्चर्यजनक था।