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धान में बौनापन रोग: हरियाणा के किसानों के लिए नई चुनौतियाँ

धान की खेती में बौनापन रोग ने हरियाणा के किसानों के लिए नई चुनौतियाँ पेश की हैं। इस रोग के कारण किसानों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कृषि वैज्ञानिकों ने इस रोग के प्रबंधन के लिए कई उपाय सुझाए हैं, जैसे संक्रमित पौधों का उखाड़ना और नष्ट करना। विशेष रूप से अंबाला, यमुनानगर, कुरुक्षेत्र, करनाल और कैथल जिलों में यह रोग अधिक देखने को मिल रहा है। जानें इस रोग से निपटने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
 

धान में बौनापन रोग का प्रकोप

धान में बौनापन रोग (हिसार): देश में धान की खेती में एक नया रोग सामने आया है, जिसे बौनापन कहा जाता है। इस रोग के कारण किसानों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने इस रोग के प्रबंधन और रोकथाम के लिए सलाह दी है।


धान की खेती और रोग का प्रभाव

राज्य में 31 लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र में धान की खेती की जा रही है। लेकिन, धान के कटोरे के रूप में जाने जाने वाले पांच जिलों में बौनापन रोग की समस्या अधिक देखी गई है। कृषि वैज्ञानिकों ने इस रोग के प्रबंधन के लिए सुझाव दिए हैं। उनके अनुसार, संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट करना आवश्यक है।


रोगग्रस्त पौधों का निपटारा

किसानों को सलाह दी गई है कि वे रोगग्रस्त पौधों की पहचान करें और उन्हें गहरे गड्ढों में दबा दें या जला दें ताकि रोग का फैलाव न हो। इसके अलावा, नालियों और मेढ़ों की नियमित सफाई करना भी आवश्यक है। खरपतवार और अनावश्यक पौधों को हटाना चाहिए, क्योंकि ये कीटों के लिए आश्रय स्थल बनते हैं। खेत में जलभराव को रोकने के लिए उचित जल निकासी की व्यवस्था भी करनी चाहिए।


पांच जिलों में बौनापन रोग की गंभीरता

बौनापन रोग की गंभीरता: कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि अंबाला, यमुनानगर, कुरुक्षेत्र, करनाल और कैथल जिलों के किसानों को इस रोग से अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जब यह रोग असामान्य रूप से बढ़ता है, तो कृषि वैज्ञानिकों द्वारा कई गाइडलाइन जारी की जाती हैं। किसानों को इन गाइडलाइनों का पालन करना चाहिए ताकि फसल को सुरक्षित रखा जा सके।


किसानों का रजिस्ट्रेशन

चार लाख से अधिक किसानों ने रजिस्ट्रेशन किया: सरकार की 'मेरी फसल मेरा ब्यौरा' योजना के तहत चार लाख 18 हजार से अधिक किसानों ने रजिस्ट्रेशन कराया है। ये किसान धान में गैर-बासमती किस्में उगाते हैं, जिसका क्षेत्रफल लगभग 25 लाख 48 हजार एकड़ है। बासमती चावल उगाने वाले किसानों का क्षेत्र अलग है।


रोगवाहक कीटों का प्रबंधन

• नियमित कीट निगरानी: खेतों का निरंतर निरीक्षण करें। प्रारंभिक अवस्था में रोग वाहक कीटों की पहचान और उनके प्रभावी नियंत्रण से इस रोग को रोकना संभव है।


• नर्सरी में सफेद पीठ वाला तेला (हापर्स) का नियंत्रण आवश्यक है। नर्सरी क्षेत्र में रोग वाहक कीटों के प्रभावी नियंत्रण के लिए वैज्ञानिकों की सलाह पर कार्य करें।