नितिन गडकरी ने इथेनॉल ईंधन पर उठे सवालों का किया स्पष्टीकरण
गडकरी का इथेनॉल के प्रति समर्थन
नई दिल्ली: केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इथेनॉल ईंधन से संबंधित उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए कहा है कि इसमें उनका कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं है। उन्होंने बताया कि वे हमेशा से वैकल्पिक ईंधन के पक्षधर रहे हैं और इथेनॉल के साथ-साथ मेथनॉल, हाइड्रोजन, बायोफ्यूल और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे सभी स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
परिवार के व्यवसाय पर गडकरी की टिप्पणी
गडकरी ने अपने बेटों के व्यवसाय के बारे में भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि उनके परिवार का इथेनॉल व्यवसाय बहुत सीमित है और इससे होने वाली आय का हिस्सा भी नगण्य है। उन्होंने यह भी बताया कि इस कारोबार पर 1,600 करोड़ रुपये का कर्ज है।
उन्होंने कहा, “मेरे परिवार के पास पहले से एक चीनी मिल है, जिसका संचालन मेरे बेटे करते हैं, जबकि इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम पेट्रोलियम मंत्रालय के अंतर्गत संचालित होता है। इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है।”
इथेनॉल उद्योग में परिवार की हिस्सेदारी
गडकरी ने स्पष्ट किया कि उनके बेटों के व्यवसाय में इथेनॉल का हिस्सा केवल 10 प्रतिशत है, और पूरे देश के इथेनॉल उद्योग में उनकी फैक्ट्रियों की हिस्सेदारी 0.5 प्रतिशत से भी कम है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार के व्यवसाय के बारे में जो बातें कही जा रही हैं, वे पूरी तरह से गलत हैं।
भारत में वैकल्पिक ईंधन का महत्व
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, इसलिए वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि वे केवल गन्ने से बने इथेनॉल का समर्थन नहीं करते, बल्कि मक्के, पराली, बांस और चावल जैसे विभिन्न स्रोतों से भी इथेनॉल का उत्पादन किया जा रहा है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हरियाणा के पानीपत में पराली से इथेनॉल बनाया जा रहा है, जबकि असम में बांस और अन्य राज्यों में चावल से भी इसका उत्पादन हो रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि ब्राजील कई दशकों से इथेनॉल का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहा है।
E85 ईंधन की कीमत पर गडकरी की राय
100 प्रतिशत पेट्रोल उपलब्ध कराने के सवाल पर गडकरी ने कहा कि इसकी कीमत उपभोक्ताओं को अधिक चुकानी पड़ेगी। उन्होंने बताया कि E85 ईंधन की कीमत E20 से भी कम है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया और अमेरिका के पास तेल के बड़े भंडार हैं, जबकि इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देश भी तेजी से बायोफ्यूल की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।