×

नूंह की मुस्लिम बेटियों ने फुटबॉल से बदली सोच

हरियाणा के नूंह जिले की मुस्लिम बेटियों ने फुटबॉल के माध्यम से न केवल खेल में बल्कि सामाजिक बदलाव में भी एक नई दिशा दिखाई है। 700 से अधिक लड़कियां प्रतिदिन फुटबॉल का अभ्यास करती हैं, और उनमें से कई ने राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भाग लिया है। इस लेख में जानें कि कैसे ये बेटियां पारंपरिक सोच को चुनौती देते हुए अपनी पहचान बना रही हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता खोल रही हैं।
 

नूंह में लड़कियों का फुटबॉल सफर

Nuh Girls Football (नूंह): हरियाणा के नूंह जिले में, जहां लड़कियों की शिक्षा और स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं, वहीं यहां की मुस्लिम बेटियां फुटबॉल के माध्यम से नई कहानी लिख रही हैं। पारंपरिक सोच को चुनौती देते हुए, ये लड़कियां अब मैदान में अपनी पहचान बना रही हैं। जिले के लगभग पांच गांवों की 700 से अधिक लड़कियां प्रतिदिन फुटबॉल का अभ्यास करती हैं।


राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भागीदारी

इनमें से 20 लड़कियां राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग ले चुकी हैं। खेल के कास्ट्यूम में मैदान पर उतरकर, इन बेटियों का सफर केवल गांव से राज्य स्तर तक नहीं, बल्कि पुरानी पाबंदियों को तोड़ने का भी है। हर किक समाज की उस सोच को चुनौती देती है, जो लड़कियों को केवल घर तक सीमित रखती है।


सामाजिक बदलाव का संकेत

मुस्लिम बहुल क्षेत्र में यह बदलाव केवल खेल का नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी प्रतीक है। आज ये बेटियां मैदान में खेलते हुए न केवल अपनी पहचान बना रही हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी रास्ता खोल रही हैं।


परिवारों की सोच में बदलाव

हाल ही में रोहतक में आयोजित राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में मुस्लिम बेटियों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। इनमें से कई लड़कियों ने पहली बार जिले से बाहर कदम रखा, और स्टेडियम तक पहुंचना उनके लिए एक सपने के सच होने जैसा था। पढ़ाई और खेल का यह सफर आसान नहीं था, लेकिन इसमें सीक्विन एनजीओ ने उनका समर्थन किया।


कौसर की प्रेरणादायक कहानी

टीम की कप्तान कौसर ने खुद को एक मिसाल बना दिया है। महज दो साल में गोलकीपर से कप्तान बनने वाली कौसर पहले दुपट्टा पहनकर खेलती थीं, जिससे उन्हें परेशानी होती थी। उन्होंने अपने परिवार को समझाया और धीरे-धीरे बदलाव आया। आज उनका परिवार उनकी सफलता पर गर्व करता है।


खाली प्लॉट में अभ्यास

एनजीओ के समीम अहमद बताते हैं कि नूंह जैसे क्षेत्र में लड़कियों को पढ़ाई के लिए घर से बाहर भेजना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में उन्हें राज्य स्तरीय प्रतियोगिता तक पहुंचाना किसी जीत से कम नहीं है। ये लड़कियां किसी स्टेडियम में नहीं, बल्कि गांव के खाली प्लॉट में अभ्यास करती हैं। दुपट्टा हटाना भी आसान नहीं था, लेकिन परिवार का विश्वास जीतकर इन्होंने यह मुकाम हासिल किया है।


संघर्ष की कहानियां

गुलपसा के पिता लकवे से पीड़ित हैं और परिवार की स्थिति बेहद कमजोर है। कोरोना काल में उनकी शादी की तैयारी हो रही थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। एनजीओ से जुड़कर पढ़ाई और खेल दोनों जारी रखे और आज आसपास की बेटियों को प्रेरित कर रही हैं। साहिला की कहानी भी संघर्ष भरी है।