नेपाल में नई सरकार के समक्ष चुनौतियों का सामना
नेपाल में चुनाव और नई सरकार की चुनौतियाँ
राजीव रंजन तिवारी | नेपाल में हाल ही में चुनाव संपन्न हुए हैं और मतगणना का अंतिम चरण भी पूरा हो चुका है। नई सरकार के गठन की प्रक्रिया अब स्पष्ट होती जा रही है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या नेपाल में पिछले साल हुई हिंसा और उथल-पुथल के कारणों का समाधान हो पाएगा। इस पर अभी भी संदेह बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नई सरकार के सामने चुनौतियों की कमी नहीं होगी। जिन कारणों से पिछले साल नेपाल में बवाल हुआ, वे अभी भी मौजूद हैं। विपक्षी दलों की सक्रियता से स्थिति और भी जटिल हो सकती है। नई सरकार को कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। पहले यह समझते हैं कि पिछले वर्ष नेपाल में बवाल क्यों हुआ।
पिछले वर्ष नेपाल में हुए विरोध प्रदर्शनों के पीछे कई कारण थे। पहला, ओली प्रशासन द्वारा चार सितंबर को जारी आदेश, जिसमें 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया गया था। सरकार का तर्क था कि इन प्लेटफॉर्म्स ने नेपाल के कानूनों का पालन नहीं किया। इस प्रतिबंध ने युवा उपयोगकर्ताओं को प्रभावित किया, जिससे उनमें आक्रोश उत्पन्न हुआ।
दूसरा कारण देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को माना गया। प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगाए और कई सरकारी इमारतों पर चढ़ने का प्रयास किया। इसके परिणामस्वरूप पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिसमें कई प्रदर्शनकारी मारे गए। 9 सितंबर को हुए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों ने पूरे देश को प्रभावित किया।
तीसरा महत्वपूर्ण कारण यह है कि नेपाल के युवा बेहतर नौकरी की तलाश में विदेश जा रहे हैं। हालांकि कोविड के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है, फिर भी बड़ी संख्या में लोग विदेश में काम करने के लिए मजबूर हैं।
चौथा कारण उद्योगों की कमी है। नेपाल में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के प्रयास सफल नहीं रहे हैं, जिससे युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हो गए हैं।
पांचवां कारण घुसपैठ का मुद्दा है। पुलिस की गोलीबारी में कई लोगों की मौत के बाद, सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ घुसपैठ का आरोप लगाया।
हाल ही में हुए चुनावों में, बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को समर्थन मिल रहा है, जबकि पारंपरिक दल पीछे रह गए हैं। यह चुनाव नेपाल के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पिछले साल की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद पहला चुनाव है।
नेपाल के लोग अपनी लोकतंत्र को गंभीरता से लेते हैं, और इस बार मतदान में उच्च भागीदारी देखी गई। लेकिन पिछले सात दशकों में चुनावी प्रक्रिया के परिणाम संतोषजनक नहीं रहे हैं।
अब यह देखना है कि नई सरकार उन मुद्दों का समाधान कैसे करेगी, जिनके कारण पिछले वर्ष हिंसा हुई थी। रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे गंभीर हैं, और नई सरकार को इन पर ध्यान देना होगा।