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नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया: तृणमूल के बागियों से मिली नई पहचान

नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) ने हाल ही में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के शामिल होने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में एक नई पहचान बनाई है। पहले सीमित पहचान रखने वाली यह पार्टी अब चर्चा का विषय बन गई है। जानें कैसे इस पार्टी ने अपने गठन के बाद त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाग लिया और चुनाव के बाद की निष्क्रियता के बावजूद, बागी सांसदों के शामिल होने से उसकी स्थिति में बदलाव आया। क्या यह पार्टी भविष्य में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक खिलाड़ी बन सकेगी? इस लेख में जानें पूरी कहानी।
 

नई दिल्ली में राजनीतिक बदलाव


नई दिल्ली: कुछ राजनीतिक दल लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान नहीं बन पाती। वहीं, कुछ घटनाएं छोटी पार्टियों को अचानक सुर्खियों में ला देती हैं। हाल ही में, नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) ने इसी तरह की स्थिति का सामना किया है। पहले सीमित पहचान रखने वाली यह पार्टी अब राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गई है। इसका मुख्य कारण तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों का इस पार्टी में शामिल होना है।


पार्टी का गठन और चुनावी सफर

नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) को 20 जनवरी 2023 को चुनाव आयोग में एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में दर्ज किया गया। दिलचस्प बात यह है कि यह पार्टी पश्चिम बंगाल में पंजीकृत होने के बावजूद अपने पहले चुनावी प्रयास में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाग ली। हालांकि, उस समय पार्टी का प्रभाव सीमित था, लेकिन हाल की घटनाओं ने इसकी स्थिति को बदल दिया है। तृणमूल कांग्रेस के कई सांसदों के शामिल होने के बाद, पार्टी अब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गई है।


सीमित संसाधनों के साथ शुरुआत

चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, पार्टी को प्रारंभिक चरण में बहुत कम आर्थिक सहायता मिली। पार्टी के दस्तावेजों में शेवली कुंडू को कोषाध्यक्ष के रूप में दर्ज किया गया है। वे कुछ अन्य संस्थाओं से भी जुड़ी रही हैं, जिनका पंजीकृत पता पार्टी के पते से मेल खाता है। पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर क्षेत्र में स्थित है। संगठन की कमान उत्तिया कुंडू के हाथों में है, जो पार्टी की अध्यक्ष हैं। राजनीतिक हलकों में उनकी पहचान सीमित रही है, लेकिन हाल की घटनाओं ने उन्हें चर्चा में ला दिया है।


त्रिपुरा में पहला चुनावी प्रयास

एनसीपीआई ने अपने गठन के तुरंत बाद त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाग लेने का निर्णय लिया। पार्टी का दावा था कि वह विशेष रूप से आदिवासी और उपेक्षित समुदायों की आवाज को राजनीतिक मंच पर लाना चाहती है। पार्टी ने कुल सात सीटों पर उम्मीदवार उतारने की योजना बनाई थी, लेकिन विभिन्न कारणों से कई उम्मीदवार चुनावी प्रक्रिया में आगे नहीं बढ़ सके। अंततः केवल कुछ सीटों पर ही पार्टी अपने चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरी।


चुनावी प्रदर्शन की चुनौतियाँ

त्रिपुरा चुनाव में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। जिन सीटों पर उसके उम्मीदवार चुनाव लड़े, वहां उसे बहुत कम वोट मिले। कोई भी प्रत्याशी प्रभावी स्थिति तक नहीं पहुंच सका। कुछ उम्मीदवारों ने निर्दलीय रूप से भी चुनाव लड़ा, लेकिन परिणामों में कोई खास बदलाव नहीं आया। कुल मिलाकर, पार्टी का प्रदर्शन ऐसा नहीं था जिससे भविष्य में उसके बड़े राजनीतिक खिलाड़ी बनने की संभावना दिखाई देती।


चुनाव के बाद की निष्क्रियता

त्रिपुरा चुनाव के बाद पार्टी की गतिविधियाँ काफी हद तक थम गईं। चुनाव लड़ने वाले कुछ स्थानीय नेताओं और उम्मीदवारों ने दावा किया कि चुनाव के बाद पार्टी नेतृत्व से उनका संपर्क लगभग समाप्त हो गया था। कई कार्यकर्ताओं का कहना था कि संगठनात्मक गतिविधियाँ बंद हो गई थीं और पार्टी सार्वजनिक रूप से लगभग गायब हो गई थी। इससे यह धारणा बनने लगी थी कि एनसीपीआई का राजनीतिक सफर बहुत लंबा नहीं चलेगा।


तृणमूल संकट के बीच नई पहचान

हालात तब बदले जब तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने की घोषणा की। इस कदम ने पार्टी की राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया। बागी सांसदों ने संसद में अलग पहचान और बैठने की व्यवस्था की मांग भी रखी। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में एनसीपीआई का नाम तेजी से चर्चा में आने लगा। तृणमूल नेताओं ने भी इस घटनाक्रम की पुष्टि की और बताया कि बागी गुट ने एनसीपीआई का दामन थाम लिया है।