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नैन सिंह रावत: भारतीय सर्वेक्षक जिन्होंने तिब्बत के रहस्यों को उजागर किया

नैन सिंह रावत, एक अद्वितीय भारतीय सर्वेक्षक, ने 19वीं सदी में तिब्बत और हिमालय के रहस्यों को उजागर किया। उनकी यात्राएं न केवल खोज अभियान थीं, बल्कि गुप्त सर्वेक्षण भी थीं। उन्होंने बिना आधुनिक उपकरणों के दूरी और ऊंचाई मापने की अनोखी तकनीकें विकसित कीं। जानें कैसे उन्होंने अपने साहस और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भारतीय उपमहाद्वीप के भूगोल को नया रूप दिया।
 

एक अद्भुत यात्रा की शुरुआत


आज के समय में किसी अनजान स्थान का नक्शा बनाना आसान है, लेकिन 150 साल पहले ऐसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। उस समय हिमालय और तिब्बत का अधिकांश हिस्सा दुनिया के लिए एक रहस्य था। इसी समय, उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के नैन सिंह रावत ने उन क्षेत्रों की यात्रा की, जिनका वैज्ञानिक सर्वेक्षण करना अत्यंत कठिन था।


सर्वेक्षण की चुनौतियाँ

उनकी विशेषता केवल यह नहीं थी कि वे हजारों किलोमीटर पैदल चले, बल्कि यह भी कि उन्होंने बिना किसी आधुनिक उपकरण के महत्वपूर्ण जानकारी जैसे रास्ते, दूरी, ऊंचाई और स्थान को दर्ज किया। Survey of India के अनुसार, 19वीं सदी में उनके जैसे सर्वेक्षकों ने भारतीय उपमहाद्वीप के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की नींव रखी।


तिब्बत में सर्वेक्षण का जोखिम

19वीं सदी में तिब्बत एक कठिन और प्रतिबंधित क्षेत्र था, जिससे यूरोपीय सर्वेक्षकों के लिए वहां काम करना जोखिम भरा था। ब्रिटिश सर्वे अधिकारियों ने भारतीयों की मदद लेने का निर्णय लिया। स्थानीय भाषा और संस्कृति की समझ रखने वाले भारतीय सर्वेक्षकों को प्रशिक्षित किया गया। इन्हें अक्सर 'पंडित' कहा जाता था।


दूरी मापने की अनोखी तकनीक

नैन सिंह और अन्य सर्वेक्षकों को एक निश्चित लंबाई के कदम रखने की ट्रेनिंग दी गई थी। कदमों की संख्या के आधार पर दूरी का अनुमान लगाया जाता था। इस प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए, प्रार्थना की माला का उपयोग किया गया, जिसमें 100 दाने होते थे। हर निश्चित संख्या में कदमों के बाद एक दाना आगे बढ़ाया जाता था, जिससे बिना कागज के भी दूरी का हिसाब रखा जा सकता था।


गुप्त सर्वेक्षण की तकनीक

सर्वेक्षण के दौरान प्रार्थना चक्र का भी इस्तेमाल किया गया। सर्वेक्षकों को ऐसी तकनीकें सिखाई गई थीं जिससे उनके नोट्स और सर्वेक्षण सामग्री धार्मिक वस्तुओं के भीतर छिपाई जा सके। यह नैन सिंह की यात्राओं को केवल खोज अभियान नहीं, बल्कि गुप्त सर्वेक्षण अभियान भी बनाता है।


1865 की ऐतिहासिक यात्रा

नैन सिंह की सबसे प्रसिद्ध यात्रा 1865-66 की थी, जिसमें उन्होंने काठमांडू से ल्हासा तक की यात्रा की। इस यात्रा में उन्होंने लगभग 1,200 मील की दूरी तय की और महत्वपूर्ण भौगोलिक जानकारी एकत्र की।


ऊंचाई मापने की वैज्ञानिक विधि

नैन सिंह ने ऊंचाई का अनुमान लगाने के लिए पानी के उबलने के तापमान का उपयोग किया। यह विधि उस समय के लिए अत्याधुनिक थी और उन्होंने ल्हासा की ऊंचाई का अनुमान भी इसी तरह लगाया।


भौगोलिक जानकारी का योगदान

नैन सिंह ने केवल दूरी दर्ज नहीं की, बल्कि खगोलीय अवलोकनों के माध्यम से स्थान की स्थिति भी निर्धारित की। उनके कार्य ने ल्हासा और तिब्बत के अन्य क्षेत्रों की भौगोलिक जानकारी को सटीक बनाया।


नैतिकता और सम्मान

1877 में Royal Geographical Society ने नैन सिंह को Patron's Medal से सम्मानित किया। उनके अभियानों ने तिब्बत और ऊपरी ब्रह्मपुत्र क्षेत्र के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की।


आज के GPS युग में उनकी कहानी का महत्व

आज हम GPS की मदद से अपनी लोकेशन देख सकते हैं, लेकिन नैन सिंह के समय में ऐसा कुछ नहीं था। उनकी कहानी हमें यह याद दिलाती है कि भारत के वैज्ञानिक इतिहास में कई ऐसे नाम हैं जो मुख्यधारा से बाहर रहे हैं।