पंजाब आंदोलन: भिंडराँवाले से जुड़ी घटनाएँ और उनके प्रभाव
भिंडराँवाले से पहली मुलाकात
मैंने भिंडराँवाले से पहली बार 1981 में मुलाकात की, जब अकाली दल ने अपना आंदोलन शुरू किया था। उस दिन उसने मुझे संबोधित करते हुए अपने विचार साझा किए। उसे बताया गया था कि मैंने उसके बारे में लिखा था कि वह हिन्दुओं और सिखों के बीच नफरत फैला रहा है। लगभग 30,000 लोगों के सामने उसने मेरे आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि वह केवल गुरुओं के उपदेशों का प्रचार कर रहा है और सिखों को उनके पूर्वजों की लड़ाकू परंपरा की ओर लौटने के लिए प्रेरित कर रहा है। मैंने उसके भाषणों के टेप सुने, जो उसके अनुयायियों द्वारा श्रद्धा से सुने जा रहे थे।
श्वेत पत्र और पंजाब का आंदोलन
आपरेशन ब्लू स्टार के बाद, केंद्र सरकार ने एक श्वेत पत्र जारी किया जिसमें पंजाब आंदोलन के कारणों और परिस्थितियों का विवरण दिया गया। इस श्वेत पत्र में बताया गया कि पंजाब में साम्प्रदायिक विद्वेष की घटनाएँ कुछ कट्टरपंथी सिखों और निरंकारियों के बीच शुरू हुईं। 1980 में निरंकारियों के आध्यात्मिक नेता की हत्या के बाद, आतंक और हिंसा ने पंजाब के राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया।
हिंसा का स्वरूप
यह विरोधाभास है कि साम्प्रदायिक पृथकतावाद उस आंदोलन का हिस्सा बन गया जो सभी पंजाबियों की शिकायतें दूर करने के लिए शुरू किया गया था। अकाली दल ने हिंसा और हत्या के तरीकों को न केवल अनुचित नहीं ठहराया, बल्कि इस प्रकार की गतिविधियों के अस्तित्व से भी इनकार किया। पंजाब में एक आक्रामक समूह द्वारा हिंसा का ढांचा धीरे-धीरे खड़ा किया गया।
आंदोलन की पृष्ठभूमि
अकाली दल द्वारा सरकार को अपनी मांगें प्रस्तुत करने से पहले, अखिल भारतीय सिख छात्र संघ और अन्य संगठनों ने अमृतसर में रैलियों का आयोजन किया। 'खालिस्तान जिन्दाबाद' के नारे लगाए गए और साम्प्रदायिक तनाव जानबूझकर पैदा किया गया। 1981 में लाला जगत नारायण की हत्या के बाद भिंडराँवाले को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद पंजाब में हिंसा का दौर शुरू हुआ, जिसमें कई हत्याएँ हुईं।
भिंडराँवाले का प्रभाव
-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।