पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति पर विवाद
जजों की नियुक्ति में संघीय परंपरा की अनदेखी
जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में सभी पक्षों की भूमिका महत्वपूर्ण है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में संघीय परंपरा की अनदेखी की गई है। पंजाब की भगवंत मान सरकार ने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करते हुए कैबिनेट की विशेष बैठक बुलाई। सरकार का आरोप है कि जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति की अधिसूचना बिना उनकी राय लिए जारी की गई, जो कि तय प्रक्रिया का उल्लंघन है।
जजों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की सिफारिश के बाद संबंधित राज्य सरकार की सहमति आवश्यक है। केंद्रीय कानून मंत्रालय ने 12 अगस्त को पत्र भेजा था, लेकिन बिना जवाब का इंतजार किए, 6 सितंबर को नियुक्ति की अधिसूचना जारी कर दी गई। अब राज्य मंत्रिमंडल ने जस्टिस मिश्रा के शपथ ग्रहण समारोह को रोकने का प्रस्ताव पारित किया है।
इस विवाद ने केंद्र और राज्य के बीच विश्वास की खाई को और गहरा कर दिया है। यह मामला केवल एक जज की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे संघीय परंपरा और न्यायपालिका की साख पर भी असर पड़ेगा। यदि किसी एक पक्ष को दरकिनार किया जाता है, तो पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं।
केंद्र का यह तर्क कि राज्य सरकार ने समय पर राय नहीं दी, स्वीकार्य नहीं है। बेहतर होगा कि केंद्र पंजाब सरकार की आपत्ति को गंभीरता से ले और संवाद के माध्यम से विश्वास हासिल करने का प्रयास करे। न्यायपालिका की साख कमजोर होने से लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।