पश्चिम बंगाल चुनाव: जीवित मतदाताओं का नरसंहार और लोकतंत्र की विफलता
लोकतंत्र का कलंक
विश्व के लोकतांत्रिक इतिहास में, विशेषकर भारत में, इस तरह के नरसंहार की कोई समानता नहीं है। मई 2026 में पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान जीवित मतदाताओं को मृत घोषित कर देना लोकतंत्र के लिए एक बड़ा कलंक है। भारत, जो खुद को सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है, के लिए यह एक गंभीर चिंता का विषय है। 27 लाख 4,283 लोग जीवित थे और वोट देने के योग्य थे, फिर भी उन्हें चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया।
भ्रष्टाचार और जीवित मतदाताओं का अपमान
हाल ही में लंदन की एक प्रमुख पत्रिका ने उत्तर प्रदेश में 'मृत लोगों' के संघ का उल्लेख किया। यह दर्शाता है कि कैसे भ्रष्टाचार के चलते जीवित व्यक्तियों को भी मृत घोषित कर दिया जाता है। लाखों लोग इस प्रक्रिया का शिकार होते हैं, और जिनके पास संघर्ष करने की शक्ति नहीं होती, वे हमेशा के लिए अपनी जमीन खो देते हैं।
चुनाव आयोग की भूमिका
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को सही करने के नाम पर एक जांच प्रक्रिया शुरू की, लेकिन क्या यह सही था? क्या यह आधार कार्ड के डाटाबेस से मिलान करके नहीं किया जा सकता था? यह सवाल उठता है कि क्या चुनाव आयोग को इस प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता नहीं रखनी चाहिए थी?
सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी
कुछ नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन अदालत ने चुनाव आयोग को फटकार नहीं लगाई। क्या यह उचित नहीं था कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाता कि वह पहले 27 लाख मतदाताओं की स्थिति की जांच करे? यह एक गंभीर मुद्दा है कि क्या भारत के नागरिकों को अब अपने मताधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।
भविष्य की चुनौतियाँ
यह सिलसिला थमने वाला नहीं है। 2029 के लोकसभा चुनाव तक मतदाताओं को इसी तरह से डिलीट करने और जीवित या मृत घोषित करने की प्रक्रिया जारी रहेगी। यह एक गंभीर चिंता का विषय है कि क्या लोकतंत्र की इस स्थिति को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे।
विपक्ष की जिम्मेदारी
विपक्ष भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है। क्या ममता बनर्जी या अन्य विपक्षी नेता इस गंभीर मुद्दे को नजरअंदाज कर सकते हैं? यदि वे चुनाव का बहिष्कार करते, तो शायद 27 लाख मतदाताओं की आत्माओं को शांति मिलती।
वैश्विक मीडिया की प्रतिक्रिया
लंदन की 'द इकोनोमिस्ट' ने चुनाव के दौरान हुई घटनाओं पर टिप्पणी की है कि भाजपा को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को सीमित करना होगा। चुनाव आयोग को निष्पक्षता से कार्य करना चाहिए, लेकिन वर्तमान में यह सत्ता के आगे झुका हुआ दिखाई देता है।