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पश्चिम बंगाल में चुनावी अधिकारियों का बंधक बनाना: ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर लगाया आरोप

पश्चिम बंगाल में चुनावी पर्यवेक्षकों के बंधक बनाए जाने की घटना ने राजनीतिक हलचल मचा दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मामले में चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई है। जानें इस विवाद के पीछे की कहानी और ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया।
 

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में चुनावी पर्यवेक्षकों के बंधक बनाए जाने की घटना पर गहरी चिंता व्यक्त की। इस पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस घटना से खुद को अलग करते हुए कहा कि अब कानून व्यवस्था उनके नियंत्रण में नहीं है। उन्होंने चुनाव आयोग को इस स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया।


मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें इस घटना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और प्रशासन अब उनके हाथों में नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य में कानून व्यवस्था चुनाव आयोग के अधीन है, जो गृह मंत्री अमित शाह की बातों का पालन करता है। उन्होंने इसे 'सुपर राष्ट्रपति शासन' करार दिया।


सीएम बनर्जी ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग कानून व्यवस्था को नियंत्रित करने में असफल रहा है। मुर्शिदाबाद में एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने कहा कि उन्हें इस घटना की जानकारी आधी रात को एक पत्रकार से मिली। उन्होंने यह भी समझा कि लोग इस स्थिति को लेकर क्यों नाराज हैं।


सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से नाम हटाने के कारण नाराज लोगों ने सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और अन्य न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया और सुनवाई की। अदालत ने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में सभी केवल राजनीतिक भाषा बोलते हैं।


मुख्य न्यायाधीश ने पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल से कहा कि यह राज्य सबसे अधिक ध्रुवीकृत है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह घटना न केवल न्यायिक अधिकारियों को डराने का प्रयास है, बल्कि न्यायालय के अधिकार को भी चुनौती देती है। यह कोई सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि न्यायिक अधिकारियों के मनोबल को गिराने की एक सोची-समझी साजिश प्रतीत होती है।


कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे किसी को भी न्यायिक अधिकारियों के काम में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देंगे। यह पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा कर्तव्य का उल्लंघन है, और अधिकारियों को यह बताना होगा कि सूचना मिलने के बावजूद उन्होंने अधिकारियों की सुरक्षित निकासी सुनिश्चित क्यों नहीं की।