पश्चिम बंगाल में प्रवासी श्रमिकों की वापसी: ममता बनर्जी की चुनौती
मुख्यमंत्री का प्रवासी श्रमिकों के लिए आह्वान
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा-शासित राज्यों से लौटने वाले बंगाली प्रवासी श्रमिकों के लिए आजीविका का आश्वासन दिया है। हालांकि, यदि ये श्रमिक बड़ी संख्या में लौटते हैं, तो राज्य प्रशासन के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन सकती है। उनके रोजगार और आजीविका की गारंटी को लागू करने में कई बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। यह स्थिति एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती के रूप में उभर रही है। पहले भी, पश्चिम बंगाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट और कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रवासी श्रमिकों के डेटा की कमी के कारण आलोचना का सामना करना पड़ा है।प्रशासन की चुनौतियाँ
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में लगभग 22 लाख प्रवासी श्रमिकों से बंगाल लौटने का आग्रह किया है। लेकिन इस योजना को सफल बनाने में तीन प्रमुख बाधाएँ हैं।
1. विश्वसनीय डेटाबेस का अभाव
प्रवासी श्रमिकों की सही संख्या और उनके वितरण का कोई प्रामाणिक डेटाबेस उपलब्ध नहीं है। बिना इस जानकारी के, सरकार के लिए प्रभावी पुनर्वास और रोजगार योजना बनाना मुश्किल है।
2. अस्थायी और स्थायी श्रमिकों की जानकारी की कमी
यह भी स्पष्ट नहीं है कि कितने श्रमिक अस्थायी हैं और कितने स्थायी। कुशल और अकुशल श्रमिकों की संख्या का कोई सही आंकड़ा नहीं है।
3. कुशल श्रमिकों के लिए सीमित अवसर
राज्य में कुशल श्रमिकों के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं। कई उद्योगों ने राज्य छोड़ दिया है, जिससे कुशल श्रमिकों के लिए पुनःस्थापन की संभावना लगभग शून्य है।
फ्लोटिंग और स्थायी प्रवासी श्रमिकों की पहचान
फ्लोटिंग श्रमिक वे होते हैं जो साल के अधिकांश समय अपने मूल स्थान पर रहते हैं और कुछ समय के लिए अन्य राज्यों में काम करने जाते हैं। दूसरी ओर, स्थायी प्रवासी श्रमिक वे हैं जो स्थायी रूप से अन्य राज्यों में बस गए हैं।
आर्थिक अंतर और श्रमिकों की वापसी
अकुशल और फ्लोटिंग श्रमिकों के लिए भी, औद्योगिक रूप से विकसित राज्यों में मिलने वाली दैनिक मजदूरी पश्चिम बंगाल की तुलना में अधिक है। यह आर्थिक अंतर इन श्रमिकों को अन्य राज्यों में बने रहने के लिए प्रेरित करता है।
मुख्यमंत्री ने पिछले साल 22 लाख प्रवासी श्रमिकों से अपील की थी कि वे वापस लौटें और उन्हें राशन कार्ड, स्वास्थ्य कार्ड और नौकरी देने का आश्वासन दिया था।