पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का विवाद: चुनाव आयोग की चुनौती
मतदाता सूची का प्रकाशन और चुनौतियाँ
यदि सब कुछ योजना के अनुसार चलता है, तो पश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को जारी की जाएगी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह अनुमति दी है कि यदि सभी दावे और आपत्तियाँ 28 फरवरी तक हल नहीं हो पाती हैं, तो आयोग अंतिम सूची के बाद पूरक सूची भी जारी कर सकता है। लेकिन यह सवाल उठता है कि पूरक सूची कब तक प्रकाशित होगी? पश्चिम बंगाल में अन्य चार राज्यों के साथ चुनाव प्रक्रिया मार्च के दूसरे सप्ताह में शुरू होने वाली है। चुनाव की घोषणा के बाद क्या दावे और आपत्तियों का निपटारा जारी रहेगा?
इस बीच, ममता बनर्जी ने यह कहकर स्थिति को और जटिल बना दिया है कि वे 80 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से नहीं हटने देंगी। अपने निर्वाचन क्षेत्र भबानीपुर में एक सभा में उन्होंने यह भी कहा कि अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को नहीं आएगी।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में 80 लाख मतदाताओं के दावे और आपत्तियों का मामला प्रस्तुत किया गया। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के सवा करोड़ मतदाताओं को उनके नाम, पिता के नाम, उम्र या लिंग से संबंधित छोटी-छोटी त्रुटियों के लिए नोटिस जारी किया। यह संख्या इतनी बड़ी है कि सभी दावों और आपत्तियों की सुनवाई पूरी करना संभव नहीं हो पाया। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वे पश्चिम बंगाल के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों बिहार और झारखंड के न्यायिक अधिकारियों को बुलाएं और उनकी निगरानी में दावे और आपत्तियों का निपटारा करें। मंगलवार से इस पर कार्य शुरू हुआ है, लेकिन सभी को पता है कि पांच दिन में 80 लाख नामों की त्रुटियों को ठीक करना संभव नहीं है।
यदि अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को जारी होती है, तो यह निश्चित है कि उसमें लाखों नाम गायब होंगे। यह स्थिति फिर से अदालत में जाएगी। सुप्रीम कोर्ट या कोई अन्य संस्था नहीं चाहेगी कि सही नाम कटें और लाखों लोग वोट डालने से वंचित रह जाएं। इससे चुनाव की समयसीमा प्रभावित होगी। ध्यान दें कि जिन 80 लाख नामों में त्रुटियाँ हैं, उनमें अधिकांश हिंदुओं के नाम हैं और ये सभी पार्टियों के समर्थक हैं। इसलिए भाजपा के प्रदेश नेता भी नहीं चाहते कि इन नामों को हटाया जाए।
यदि अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन रुका, तो चुनाव की तारीख को आगे बढ़ाना पड़ेगा, जिससे राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने की स्थिति भी बन सकती है। लेकिन ममता बनर्जी इसके लिए तैयार नहीं होंगी। इसलिए, समाधान यह है कि चुनाव आयोग 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची जारी करे और उसके बाद भी दावे और आपत्तियों की सुनवाई जारी रहे। चुनाव आयोग नामांकन शुरू होने के दिन तक नाम जोड़ने के आवेदन स्वीकार करता है और मतदान के दिन उन नामों की एक अलग सूची मतदान केंद्रों पर उपलब्ध रहती है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले को देख रहा है, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि सही मतदाताओं के नाम नहीं कटेंगे और चुनाव समय पर होंगे।