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पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव: सबरीमाला और महिला आरक्षण का मुद्दा

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के बीच सबरीमाला और महिला आरक्षण के मुद्दे ने राजनीतिक चर्चा को गरमा दिया है। जहां एक ओर भाजपा धार्मिक परंपराओं का हवाला देकर महिलाओं के अधिकारों को सीमित करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर महिला आरक्षण के लिए नए कानूनों का प्रस्ताव भी सामने आया है। इस लेख में जानें कि कैसे ये मुद्दे चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर रहे हैं और क्या यह सब कुछ चुनावी समय की रणनीति का हिस्सा है।
 

विधानसभा चुनावों का दौर

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, जिनमें से दो राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में मतदान संपन्न हो चुका है। गुरुवार को असम, केरल और पुडुचेरी में वोटिंग हुई। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा। इस चुनावी प्रक्रिया में विभिन्न घटनाक्रम और उपायों का होना दिलचस्प है। यह देखना महत्वपूर्ण है कि संवैधानिक संस्थाएं और न्यायपालिका किस प्रकार की गतिविधियों में संलग्न हैं, खासकर उनकी टाइमिंग। उदाहरण के लिए, सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश का मामला सुप्रीम कोर्ट में लगभग तीन वर्षों से लंबित है।


सबरीमाला का मामला और भाजपा की रणनीति

जब शरद बोबडे चीफ जस्टिस थे, तब उन्होंने इस मामले की सुनवाई के लिए बड़ी बेंच का गठन किया था। लेकिन अब, चुनाव से पहले अचानक सबरीमाला का मामला फिर से सुर्खियों में आ गया है, जिसमें केंद्र सरकार, यानी भाजपा, को अपनी बात रखने का अवसर मिला है। भाजपा का जोर इस बात पर है कि धार्मिक परंपरा सर्वोपरि है और महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। केरल में भाजपा को हिंदू ध्रुवीकरण की आवश्यकता है, जो चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जरूरी है।


महिला आरक्षण का मुद्दा

केंद्र में भाजपा की सरकार है, जो हमेशा पार्टी के हित में काम करती है। हाल ही में, सरकार ने महिला आरक्षण को 2034 से नहीं, बल्कि 2029 से लागू करने का निर्णय लिया। इसके लिए संसद के बजट सत्र को आगे बढ़ाया गया और बिल को तेजी से तैयार किया गया। बुधवार, 8 अप्रैल को कैबिनेट ने इस बिल को मंजूरी दी, और अगले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लेख सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण की आवश्यकता पर जोर दिया। इस समय, जब केरल, असम और पुडुचेरी में मतदान हो रहा था, लोग प्रधानमंत्री का लेख पढ़ रहे थे, जिसमें महिला आरक्षण पर चर्चा की गई थी। यह एक विरोधाभास है कि एक ओर धर्म के नाम पर महिलाओं के अधिकारों को नकारा जा रहा है, जबकि दूसरी ओर उनके अधिकारों के लिए कानून बनाया जा रहा है। चुनाव आयोग की गतिविधियाँ भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।