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पीएम विश्वकर्मा योजना में बदलाव की आवश्यकता: संसद की स्थायी समिति की सिफारिशें

नई दिल्ली में संसद की उद्योग संबंधी स्थायी समिति ने पीएम विश्वकर्मा योजना में सुधार के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। समिति ने पारंपरिक पेशों के नामों को बदलने की सिफारिश की है ताकि वे अधिक तटस्थ और कौशल आधारित बन सकें। इसके अलावा, बजट में कटौती पर चिंता जताई गई है, जिससे योजना की स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है। जानें इस योजना में प्रस्तावित बदलावों और नई सूची बनाने की सिफारिशों के बारे में।
 

नई दिल्ली में महत्वपूर्ण सिफारिशें


नई दिल्ली: संसद की उद्योग संबंधी स्थायी समिति ने पीएम विश्वकर्मा योजना के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। समिति का मानना है कि पारंपरिक पेशों को जाति से जोड़ने की धारणा को बदलने की आवश्यकता है। इसीलिए, समिति ने योजना में शामिल कई पेशों के नामों को बदलकर उन्हें अधिक तटस्थ और कौशल आधारित बनाने की सिफारिश की है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि योजना अधिक समावेशी बने और देश के हर क्षेत्र में लोग बिना किसी सामाजिक पूर्वाग्रह के इसका लाभ उठा सकें।


योजना में बदलाव की सिफारिश

संसदीय समिति का कहना है कि पीएम विश्वकर्मा योजना में शामिल कुछ पेशों के नाम सीधे तौर पर जाति या पारंपरिक सामाजिक पहचान से जुड़े हुए हैं। इससे योजना की स्वीकार्यता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। समिति ने सुझाव दिया है कि इन पेशों के नामों को बदलकर उन्हें अधिक पेशेवर और कार्य आधारित बनाया जाए, ताकि लाभार्थियों की पहचान उनके कौशल के आधार पर हो सके, न कि किसी सामाजिक वर्ग से जोड़कर।


नए नामों के सुझाव

समिति ने उदाहरण देते हुए बताया कि 'मोची' शब्द की जगह 'जूते का कारीगर' या 'फुटवियर आर्टिजन' जैसे नामों का उपयोग किया जा सकता है। इसी तरह, 'कुम्हार' को 'मिट्टी और सिरेमिक उत्पाद निर्माता' कहा जा सकता है। नाई के लिए 'व्यक्तिगत सौंदर्य सेवा प्रदाता' जैसे तटस्थ शब्दों का उपयोग करने का सुझाव दिया गया है। समिति का मानना है कि इससे पेशों की गरिमा बढ़ेगी और पारंपरिक कारीगरों को नई पहचान मिलेगी।


बजट में कटौती पर चिंता

समिति ने योजना के बजट को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026-27 के बजट अनुमान में योजना के लिए आवंटन घटाकर लगभग 3,860.89 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जबकि 2025-26 में यह लगभग 25,100 करोड़ रुपये था। समिति का कहना है कि योजना में बड़ी संख्या में पंजीकरण हो रहे हैं, इसलिए बजट में इतनी बड़ी कमी पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।


नई सूची बनाने की सिफारिश

समिति ने सरकार से यह भी अनुरोध किया है कि राज्यों और सामाजिक विशेषज्ञों के साथ चर्चा कर योजना के अंतर्गत पेशों की एक नई और मानकीकृत सूची तैयार की जाए। इससे देशभर में एक समान प्रणाली लागू की जा सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बदलावों से पारंपरिक कारीगरों को सम्मानजनक पहचान मिलेगी और वे आधुनिक उद्यमियों के रूप में आगे बढ़ने के लिए अधिक प्रोत्साहित होंगे।