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पीके बनर्जी: फुटबॉल के महानायक की प्रेरणादायक कहानी

प्रदीप कुमार बनर्जी, भारतीय फुटबॉल के एक महानायक, ने 1962 के एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन संघर्ष और सफलता की प्रेरणादायक कहानी है। जानें कैसे उन्होंने 15 साल की उम्र में नौकरी पाई, ओलंपिक में भारत का नाम रोशन किया और फुटबॉल में अपनी उत्कृष्टता के लिए 'अर्जुन पुरस्कार' से सम्मानित हुए। पीके बनर्जी की कहानी न केवल खेल के प्रति उनके समर्पण को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे उन्होंने कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने सपनों को साकार किया।
 

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

नई दिल्ली - प्रदीप कुमार बनर्जी, जिन्हें भारतीय फुटबॉल के दिग्गज खिलाड़ियों और कोचों में गिना जाता है, ने 1962 के एशियन गेम्स में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें 'अर्जुन पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया है और वे भारतीय फुटबॉल के प्रेरणास्त्रोत माने जाते हैं। 23 जून 1936 को पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में जन्मे, उनका परिवार विभाजन से पहले जमशेदपुर में बस गया था। उनके पिता, प्रोवत बनर्जी, सरकारी कर्मचारी थे, लेकिन उनकी आय परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं थी। इसके बावजूद, पीके ने पढ़ाई के साथ-साथ खेल को जारी रखा। परिवार के कलकत्ता जाने के बाद, उनके पिता का निधन हो गया, जिससे परिवार की जिम्मेदारियां उन पर आ गईं।


खेल में उत्कृष्टता

पीके बनर्जी ने अक्सर खाली पेट ट्रेनिंग की और फुटबॉल में अपनी प्रतिभा के बल पर मात्र 15 वर्ष की आयु में एक केबल कंपनी में नौकरी प्राप्त की। उन्हें 135 रुपए प्रति माह मिलते थे। 17 साल की उम्र में, उन्होंने भारतीय रेलवे में टिकट कलेक्टर के रूप में कार्य करना शुरू किया। उनके खेल कौशल ने चयनकर्ताओं को प्रभावित किया, और उन्होंने 1954 में आर्यन फुटबॉल क्लब और 1955 में ईस्टर्न रेलवे से जुड़कर अपनी टीम को 1958 में फुटबॉल लीग चैंपियन बनाया।


अंतरराष्ट्रीय करियर

1955 में, पीके ने भारतीय टीम के लिए डेब्यू किया और 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में भारत को सेमीफाइनल तक पहुँचाया। 1960 के रोम ओलंपिक में, उन्होंने भारतीय टीम की कप्तानी की और फ्रांस के खिलाफ महत्वपूर्ण गोल दागा, जिससे मैच 1-1 से ड्रॉ हुआ। लगभग दो साल बाद, उन्होंने एशियन गेम्स में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया, जहां उनकी स्ट्राइक पार्टनरशिप को 'त्रिमूर्ति' कहा गया।


कोचिंग और विरासत

1961 में, पीके को फुटबॉल में उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए 'अर्जुन पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। उन्होंने 1967 में अपने खेल करियर को समाप्त किया, जिसमें उन्होंने 84 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 65 गोल किए। खिलाड़ी के रूप में संन्यास लेने के बाद, उन्होंने कोचिंग में कदम रखा और 1970 के एशियन गेम्स के लिए भारतीय टीम के संयुक्त कोच बने। 2004 में, उन्हें 'फीफा ऑर्डर ऑफ मेरिट (शताब्दी)' से सम्मानित किया गया। 20 मार्च 2020 को, 83 वर्ष की आयु में, पीके बनर्जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।