पूर्वोत्तर में भाजपा का राजनीतिक संकट: सहयोगी पार्टियों का साथ छोड़ना
भाजपा का पूर्वोत्तर में विस्तार और वर्तमान चुनौतियाँ
2014 में केंद्र में सरकार बनने के बाद से भाजपा ने पूर्वोत्तर में तेजी से अपनी स्थिति मजबूत की। कुछ ही वर्षों में, भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों ने इस क्षेत्र के अधिकांश राज्यों में सरकारें बना लीं। लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भाजपा की स्थिति कमजोर हो रही है। कई सहयोगी पार्टियाँ भाजपा से दूरी बना रही हैं या उसका साथ छोड़ रही हैं।
हाल ही में मेघालय की सहयोगी पार्टी ने भाजपा से अलग होने का निर्णय लिया। अरुणाचल प्रदेश में भी भाजपा की सहयोगी पर कानूनी दबाव बढ़ रहा है, जबकि नगालैंड में दो क्षेत्रीय पार्टियों ने मिलकर भाजपा पर अपनी निर्भरता कम कर ली है।
त्रिपुरा में हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा की पुरानी सहयोगी तिपरा मोथा ने शानदार प्रदर्शन किया। तिपरा ट्राइबल एरिया ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट कौंसिल के चुनाव में भाजपा को बड़ा झटका लगा, जहां उसने पहले जीती हुई आठ में से चार सीटें खो दीं। भाजपा को केवल चार सीटें मिलीं, जबकि तिपरा मोथा की सीटें 18 से बढ़कर 24 हो गईं।
यह ध्यान देने योग्य है कि त्रिपुरा में भाजपा ने अपने मुख्यमंत्री बिप्लब देब को हटाकर कांग्रेस से आए माणिक साहा को मुख्यमंत्री बनाया है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री अन्य पार्टियों से आए हैं। असम, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश में भाजपा का अपना मुख्यमंत्री है, और सभी कांग्रेस से आए हैं।