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पेट्रोलियम उत्पादों पर जीएसटी का न आना: एक गहरी नजर

इस लेख में पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में न लाने के पीछे के कारणों का विश्लेषण किया गया है। यह बताया गया है कि कैसे सरकार और राज्य सरकारें कर से अधिक कमाई कर रही हैं और इसके परिणामस्वरूप आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। इसके अलावा, ऊर्जा की बचत और वैकल्पिक ऊर्जा के विकास की आवश्यकता पर भी चर्चा की गई है। क्या यह अभियान आगे बढ़ेगा? जानने के लिए पढ़ें।
 

सरकार की पेट्रोलियम नीति पर सवाल


जब आप इस पूरे परिदृश्य पर ध्यान देंगे, तो यह स्पष्ट होगा कि सरकार पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में क्यों नहीं लाना चाहती। यदि सरकार और राज्य सरकारें कर से अधिक कमाई करती हैं, तो तेल कंपनियां और रिफाइनरियां भी लाभ में हैं। यदि यह खेल समाप्त हो जाए, तो लोगों के लाखों करोड़ रुपये बच सकते हैं।


बंगाल सहित चार राज्यों के चुनावों के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खाड़ी युद्ध से उत्पन्न आर्थिक स्थिति का उल्लेख करते हुए लोगों को चेताया और कुछ कठोर कदम उठाने का संकेत दिया। तब तक युद्ध का प्रभाव कम हो चुका था और सुलह की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी थी। सरकार को तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि करनी पड़ी, लेकिन यह उतनी नहीं थी जितनी की आशंका थी। इसका एक कारण यह था कि सरकार ने लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में गिरावट के बावजूद घरेलू कीमतें नहीं घटाईं, बल्कि कर बढ़ाकर लोगों से 'देश के विकास' में योगदान लिया।


प्रधानमंत्री ने अपने राष्ट्र संबोधन में किफायत बरतने की सलाह दी और अपने काफिले में केवल चार गाड़ियों को रखा। अब प्रधानमंत्री को खुद इस पहल की शुरुआत करनी चाहिए और भाजपा के मंत्रियों और नेताओं को भी इस दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए।


मई में, चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद, पेट्रोल की खपत में 6.5 प्रतिशत की कमी आई। एलपीजी की खपत में 6 प्रतिशत और डीजल की खपत में 3.6 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। यदि तीन हफ्तों की दिखावटी किफायत का यह प्रभाव है, तो यह उम्मीद की जानी चाहिए कि यह प्रयास जारी रहे।


हालांकि, यह दुखद है कि एक महीने के भीतर प्रधानमंत्री और अन्य इस अभियान को भूल गए हैं। इस सकारात्मक खबर के बाद, इस पहल को और व्यवस्थित तरीके से चलाना चाहिए था। ऊर्जा की बचत का मुद्दा हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह खाड़ी संकट ने स्पष्ट कर दिया है।


इस संकट में प्रधानमंत्री द्वारा दिखाया गया रास्ता महत्वपूर्ण है और इसे आगे बढ़ाना चाहिए। गैस की खपत में कमी की गुंजाइश नहीं है, लेकिन पेट्रोल और डीजल की खपत में काफी हिस्सा दिखावे के लिए होता है।


देश में ऊर्जा के साधनों का स्वदेशी विकास भी आवश्यक है। पहले, देश अपनी जरूरत का लगभग 40 प्रतिशत तेल खुद निकालता था, लेकिन अब यह 10 प्रतिशत से भी कम हो गया है।


सरकारी पेट्रोलियम कंपनियां तेल मंगाती हैं और अपने देशवासियों को बेचकर मुनाफा कमाती हैं। यदि आप इस पूरे खेल को ध्यान से देखेंगे, तो समझ में आएगा कि सरकार पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में क्यों नहीं लाना चाहती।


हालांकि, इससे भी बड़ा मुद्दा वैकल्पिक ऊर्जा के विकास की अनदेखी करना है। सौर और बिजली आधारित वाहनों का जोर दिखता है, लेकिन यह कुछ कंपनियों और देशों को खुश करने के लिए है।


एक घोषित कारण कार्बन उत्सर्जन संधि पर हस्ताक्षर करना है, लेकिन जिस देश के पास अगले चार-पांच सौ साल तक की जरूरत के लिए कोयला हो, वह उसे कम कर दे, यह समझ से परे है।