×

प्रधानमंत्री मोदी का 'नाराज फूफा' जुमला और आंकड़ों पर उठते सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'नाराज फूफा' जुमला गढ़ा, जो विकास दर के आंकड़ों पर उठते सवालों को लेकर चर्चा का विषय बना। वडोदरा में रेलवे कार्यक्रम के दौरान उन्होंने इस जुमले का उपयोग किया, जिससे आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे। जानें कैसे सरकार के दावों और जमीनी सचाई में अंतर ने लोगों के मन में अविश्वास पैदा किया है। क्या मोदी सरकार को अपने दावों को प्रमाणित करने की आवश्यकता है? इस लेख में जानें पूरी कहानी।
 

विकास दर के आंकड़ों पर बहस

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के विकास दर के आंकड़ों को लेकर बहस थमने का नाम नहीं ले रही है। इस पर सवाल उठाने वालों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'नाराज फूफा' का जुमला गढ़ा। यह जुमला उन्होंने 5 सितंबर को शिक्षक दिवस पर दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में 'जेन जी' को संबोधित करते हुए कहा था। इसके बाद 8 सितंबर को वडोदरा में भी उन्होंने इसे दोहराया।


वडोदरा में प्रधानमंत्री ने भारतीय रेलवे के एक कार्यक्रम में भाग लिया और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के समय में विचार किया गया था, लेकिन कांग्रेस की फाइल अटकाने की प्रवृत्ति के कारण इसमें देरी हुई। रेल मंत्री और प्रधानमंत्री ने इस पर विस्तार से चर्चा की, जिसके बाद टेलीविजन चैनलों पर इस पर बहस शुरू हुई कि कैसे 2004 से 2014 के बीच केवल एक किलोमीटर का फ्रेट कॉरिडोर बना, जबकि अब प्रधानमंत्री ने लगभग डेढ़ हजार किलोमीटर का उद्घाटन किया।


इससे यह समझने की आवश्यकता है कि सरकार के आंकड़ों पर सवाल क्यों उठते हैं और लोगों का उन पर विश्वास क्यों नहीं बनता। यह समझाने के लिए कई उदाहरण हैं, लेकिन 'नाराज फूफा' के जुमले के बाद वडोदरा के रेलवे कार्यक्रम का संदर्भ लेना उचित होगा। यह सच है कि 10वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2002-2007 के बीच डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की परियोजना पर विचार किया गया।


2004 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनी, जिसने डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के लिए विशेष उद्देश्य वाहन बनाने का आदेश दिया। इसके बाद जापान और विश्व बैंक से कर्ज के लिए संपर्क किया गया। इस प्रक्रिया में काफी समय लगा। 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान काम आगे बढ़ा। जापान ने 2008 में और विश्व बैंक ने 2011 में कर्ज की मंजूरी दी, जिसके बाद काम शुरू हुआ।


प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में बुलेट ट्रेन की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक इसका परिचालन शुरू नहीं हुआ है। यह भारत की वास्तविकता है कि किसी नई परियोजना के शुरू होने और पूर्ण होने में समय लगता है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि 2027 में बुलेट ट्रेन का पहला चरण शुरू होगा, लेकिन इससे पहले की प्रक्रिया में 10 साल से अधिक का समय लगेगा।


सरकार के आंकड़ों और दावों पर सवाल उठने का एक कारण यह है कि आंकड़े अधूरे होते हैं और कई बातें छिपाई जाती हैं। उदाहरण के लिए, कोरोना महामारी के दौरान सरकार ने पहले इसकी गंभीरता को छिपाया और फिर अचानक देश को बंद कर दिया। जब स्थिति बिगड़ी, तो सरकार ने कई उलटे सीधे दावे किए।


नोटबंदी के समय भी ऐसा ही हुआ। सरकार ने दावा किया कि वित्त वर्ष 2016-17 में आर्थिक विकास दर 8.2 फीसदी रही, जबकि वास्तविकता इससे अलग थी। पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है। उन्होंने बताया कि कैसे सरकार ने 2017 में उपभोक्ता सर्वेक्षण रोक दिया।


इस तरह के दावों और घोषणाओं के बीच जमीनी सचाई में जो अंतर है, उसने लोगों के मन में अविश्वास बढ़ाया है। अब लोग चाहते हैं कि सरकार अपने दावों को प्रमाणित करे। यह बदलाव सुब्रमण्यम ने 'ट्रस्ट बट वेरिफाई' से 'डाउट बट रिमेन ओपन' के रूपक से परिभाषित किया है।


लोगों की नाराजगी अब बढ़ती जा रही है। हवाई चप्पल वाला भी हवाई जहाज में चलेगा, यह अब मजाक नहीं रह गया है। इसलिए सरकार के दावों और आंकड़ों पर विश्वास कम हो रहा है। जीडीपी की विकास दर का मौजूदा आंकड़ा भले ही सही हो, लेकिन सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।