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प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का निधन, शायरी में छोडा अमिट निशान

उर्दू के प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का निधन 91 वर्ष की आयु में हो गया। उनकी शायरी ने लाखों लोगों के दिलों में जगह बनाई। जावेद अख्तर ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया और उनकी रचनाओं को याद किया। बशीर बद्र ने न केवल शायरी में योगदान दिया, बल्कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया। उनके जीवन और रचनाओं के बारे में जानें।
 

उर्दू शायरी के दिग्गज का निधन

उर्दू के प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का निधन हो गया है। उन्होंने 91 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कहा। बशीर बद्र के कई शेर आज भी लाखों लोगों के दिलों में बसे हुए हैं, जिसके कारण उनके निधन की खबर से प्रशंसकों में गहरा शोक छा गया है। जावेद अख्तर ने भी इस अवसर पर शोक व्यक्त किया और अपने एक्स अकाउंट पर बशीर बद्र की शायरी साझा की।


शायरी की अनोखी विशेषता

बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने साधारण शब्दों का खूबसूरत उपयोग किया। उनकी रचनाएँ लाखों लोगों की भावनाओं को व्यक्त करती थीं। उन्होंने न केवल उर्दू शायरी में महत्वपूर्ण योगदान दिया, बल्कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में छात्रों को उर्दू भाषा की शिक्षा भी दी। उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।


जावेद अख्तर का शोक संदेश

जावेद अख्तर ने बशीर बद्र के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने लिखा, 'आज हमारी उर्दू भाषा एक महान शायर से वंचित हो गई है। बशीर बद्र ऐसे शायर थे जो हमेशा महफिल को रोशन करते थे। उनकी शायरी हमारी यादों में हमेशा जीवित रहेगी।'


शिक्षक के रूप में बशीर बद्र

बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्हें बचपन से ही शायरी में रुचि थी। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से प्राप्त की और वहीं से पीएचडी की। इसके बाद, वह उर्दू के प्रोफेसर बने और छात्रों को पढ़ाते हुए कई प्रसिद्ध शायरी लिखीं। उन्होंने भारत-पाकिस्तान के संबंधों पर भी कई शेर लिखे।


शिमला समझौते का प्रसिद्ध शेर

बशीर बद्र ने देश और विभाजन पर कई शेर लिखे, जिनमें से एक शेर शिमला समझौते के दौरान बहुत प्रसिद्ध हुआ। कहा जाता है कि 1972 में इंदिरा गांधी ने यह शेर जुल्फिकार अली भुट्टो को सुनाया था।


'दुश्मनी जमके करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों'


बशीर बद्र के कुछ प्रसिद्ध शेर

1. इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं, मुझे उन का कोई पता नहीं


2. अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है
मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे


3. आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा


4. कभी-कभी तो छलक पड़ती हैं यूँ ही आँखें
उदास होने का कोई सबब नहीं होता


5. घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया, कोई आदमी न मिला


6. लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में


7. सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा


8. मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला


9. मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी


10. कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता