बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों पर बढ़ता खतरा: मानवाधिकार संगठन की चेतावनी
बांग्लादेश में धार्मिक स्वतंत्रता का संकट
ढाका: बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाले एक प्रमुख संगठन ने हिंदू अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों की रक्षा करने वालों पर बढ़ते दबाव को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। संगठन का कहना है कि गाइबांधा से लेकर चट्टोग्राम तक की हालिया घटनाएं धार्मिक स्वतंत्रता के लिए बढ़ते खतरों का संकेत देती हैं।
ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (एचआरसीबीएम) के अनुसार, उत्तरी बांग्लादेश में एक हिंदू मंदिर परिसर अब धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और बहुसंख्यकवादी दबाव के खिलाफ चल रहे संघर्ष का नया केंद्र बन गया है।
एचआरसीबीएम ने कहा, “विवाद का केंद्र गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी स्थित श्री श्री राधा गोविंद एवं काली मंदिर परिसर है, जहां मंदिर प्रबंधन ने भगवान राम की एक विशाल प्रतिमा का निर्माण शुरू किया था। यह मामला मंदिर परिसर के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय की वैध धार्मिक अभिव्यक्ति तक सीमित रहना चाहिए था, लेकिन यह जल्द ही सार्वजनिक विरोध, सोशल मीडिया पर आक्रोश, प्रतिमा हटाने की मांग और धमकियों में बदल गया। इससे स्थानीय हिंदू समुदाय अपने जीवन, पूजा-अर्चना और देश में अपने भविष्य को लेकर भयभीत है।”
यह टिप्पणी उस समय आई है जब स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेशी प्रशासन ने हाल ही में गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी उपजिला स्थित श्री श्री राधा गोविंद एवं काली मंदिर में भगवान राम की प्रतिमा के निर्माण कार्य को रोकने का आदेश दिया है।
संगठन ने मंदिर के संस्थापक हरिदास चंद्र तरणी दास से की गई अपनी फील्ड बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि राम प्रतिमा का निर्माण मंदिर की निजी भूमि पर किया जा रहा था, न कि सरकारी भूमि पर, और यह कार्य हिंदू श्रद्धालुओं तथा समुदाय के सहयोग से किया जा रहा था।
एचआरसीबीएम ने कहा, “लेकिन गाइबांधा में सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह विवाद कानूनी या प्रशासनिक दायरे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सांप्रदायिक मुद्दा बन गया। कुछ लोगों ने एक हिंदू प्रतिमा को देश की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा या सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत किया। इस तरह की सोच अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक आस्था को सार्वजनिक खतरे में बदल देती है। इससे हिंदुओं के प्रति सामूहिक संदेह पैदा होता है, केवल इसलिए कि वे मंदिर बनाते हैं, एकत्रित होते हैं, पूजा करते हैं और अपनी पहचान के साथ दिखाई देते हैं।”
संगठन ने आरोप लगाया कि बांग्लादेशी प्रशासन मंदिर परियोजना के खिलाफ “कट्टरपंथी लामबंदी” को पूरी तरह नियंत्रित करने में सफल नहीं रहा है। संगठन का कहना है कि पुलिस की मौजूदगी और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बावजूद, कट्टरपंथी समूह और स्वार्थी तत्व अल्पसंख्यक समुदाय पर लगातार दबाव बना रहे हैं।
संगठन ने मंदिर परिसर की प्रभावी सुरक्षा, मंदिर के संस्थापक हरिदास चंद्र तरणी दास और श्रद्धालुओं की सुरक्षा, धमकियों और भड़काऊ गतिविधियों की जांच, सांप्रदायिक तनाव को रोकने तथा अल्पसंख्यक समुदाय को विभाजित और कमजोर करने वाले दबावपूर्ण तरीकों को समाप्त करने की मांग की है।
संगठन ने कहा, “गाइबांधा का यह मामला अब इस बात की परीक्षा बन गया है कि क्या प्रशासन वास्तव में संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करेगा, या फिर अशांति को नियंत्रित करने के नाम पर धमकियों का सामना कर रहे अल्पसंख्यक समुदाय से ही पीछे हटने की अपेक्षा करेगा।”
एचआरसीबीएम ने आगे कहा कि गाइबांधा विवाद बांग्लादेश के सार्वजनिक जीवन में मौजूद एक गहरे और खतरनाक दोहरे मापदंड को उजागर करता है। संगठन का आरोप है कि जहां अल्पसंख्यकों पर ईशनिंदा के आरोप लगने पर गिरफ्तारी, भीड़ की हिंसा, विस्थापन और यहां तक कि मौत जैसी घटनाएं हो जाती हैं, वहीं हिंदू देवी-देवताओं और उनकी धार्मिक भावनाओं के सार्वजनिक अपमान को अक्सर गंभीर अपराध मानने के बजाय “राजनीतिक रूप से संभालने योग्य” अव्यवस्था के रूप में देखा जाता है।
हाल ही में बांग्लादेश में गाइबांधा जिले में भगवान राम की सबसे ऊंची प्रतिमा के निर्माण का विरोध कर रहे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों के प्रदर्शन के दौरान भगवान राम की एक तस्वीर के कथित अपमान को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज हो गए थे।