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बिट्टू तबाही की पहल: नदियों के प्रदूषण के खिलाफ एक संघर्ष

मध्य प्रदेश के ब्यावरा में बिट्टू तबाही ने नदी अजनार की सफाई कर प्रदूषण की समस्या को उजागर किया है। उनके प्रयास ने नदियों में बढ़ते प्लास्टिक कचरे की गंभीरता को दर्शाया है। भारत में प्लास्टिक कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है, जबकि इसके प्रबंधन में कमी आ रही है। जानें कैसे आम जीवन में प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है और इसके प्रभावों के बारे में।
 

बिट्टू तबाही का प्रयास

हाल ही में मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा में रहने वाले सुरेंद्र सिंह चौधरी, जिन्हें बिट्टू तबाही के नाम से जाना जाता है, ने नदी अजनार की सफाई कर सबका ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कई महीनों में नदी में जमा कचरे को हटाया, जिससे अब यह नदी काफी हद तक साफ नजर आ रही है। बिट्टू के इस प्रयास ने न केवल प्रशंसा बटोरी, बल्कि नदियों के प्रदूषण की समस्या को भी उजागर किया। उनके पुराने वीडियो में नदी में प्लास्टिक कचरे की भरमार देखी जा सकती है, जो अन्य नदियों में भी आम है। यह प्लास्टिक कचरा खुली जगहों, डंपिंग साइटों, नालियों और जलाशयों में जमा होता जा रहा है, जिसके गंभीर परिणाम जलभराव, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में सामने आ रहे हैं.


प्लास्टिक कचरे की बढ़ती समस्या

पिछले कुछ वर्षों में प्लास्टिक का उपयोग घटने के बजाय बढ़ा है। भारत सरकार ने हाल ही में संसद में बताया कि 2020-21 में 41.26 लाख टन, 2021-22 में 39.01 लाख टन और 2022-23 में 42.36 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न हुआ। इसका मतलब है कि हर भारतीय औसतन 3.6 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा पैदा करता है। इस कचरे में से लगभग 60 प्रतिशत का ही पुनर्चक्रण किया जा पाता है, जबकि 40 प्रतिशत कचरा खुले डंपिंग ग्राउंड, लैंडफिल और जलाशयों में फेंक दिया जाता है.


प्लास्टिक कचरे का स्रोत

सुबह उठते ही हम दांतों की सफाई के लिए ब्रश का उपयोग करते हैं, जो प्लास्टिक से बना होता है। बाथरूम में शैंपू की बोतलें, साबुन के रैपर और अन्य सामान भी प्लास्टिक के होते हैं। किचन में पैकेज्ड दूध और सब्जियां भी प्लास्टिक में आती हैं। पूजा की सामग्रियां भी प्लास्टिक के पैकेट में होती हैं। इसी तरह, खाना पकाने में इस्तेमाल होने वाले मसाले, तेल और स्नैक्स भी प्लास्टिक में पैक होते हैं। नतीजतन, हर दिन निकलने वाले कचरे में एक बड़ा हिस्सा प्लास्टिक का होता है.


कचरे का प्रबंधन

महानगरों में निकला कचरा प्रोसेसिंग प्लांट तक पहुंचता है, जहां इसे रीसायकल किया जा सकता है। लेकिन छोटे शहरों और गांवों में यह कचरा कहीं भी फेंक दिया जाता है। यह धीरे-धीरे जमा होता है और प्लास्टिक सड़ता नहीं है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और जलभराव होता है। कई बार यह बारिश के दौरान नदियों और नालों के माध्यम से समुद्र तक पहुंच जाता है.


भारत में प्लास्टिक कचरे का वितरण

भारत में कुल प्लास्टिक कचरे में कर्नाटक का हिस्सा 13.5 प्रतिशत, तेलंगाना का 12.7 प्रतिशत, तमिलनाडु का 10.2 प्रतिशत और दिल्ली का 9.7 प्रतिशत है। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में 9.7 प्रतिशत, गुजरात में 8.1 प्रतिशत और महाराष्ट्र में 7.5 प्रतिशत कचरा उत्पन्न होता है.


कचरे के प्रबंधन की स्थिति

केंद्र सरकार ने बताया कि 5 दिसंबर 2024 तक भारत में केवल 978 ऐसी यूनिट थीं, जहां प्लास्टिक कचरे की प्रोसेसिंग या रीसाइक्लिंग की जा सकती थी। तमिलनाडु में सबसे ज्यादा 326 यूनिट हैं, जबकि अन्य राज्यों में यह संख्या कम है। हैरानी की बात यह है कि कई राज्यों में एक भी यूनिट नहीं है। NITI आयोग की 2023 की रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल 17 प्रतिशत परिवारों में कचरे को अलग-अलग रखा जाता है.


भविष्य की चुनौतियाँ

ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में प्लास्टिक कचरे की समस्या तेजी से बढ़ रही है, जबकि इसके विकल्प या रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया में कोई खास प्रगति नहीं हो रही है। प्लास्टिक की पैकिंग की आसान उपलब्धता और कम कीमत के कारण इसका उपयोग बढ़ता जा रहा है। यदि यह स्थिति बनी रही, तो बिट्टू तबाही जैसे युवा भी प्राकृतिक स्थानों को साफ करने में असमर्थ रहेंगे.