बिहार की राजनीति में अस्थिरता: नीतीश कुमार का इस्तीफा और संवैधानिक प्रश्न
बिहार की राजनीतिक स्थिति
बिहार की राजनीति इस समय एक प्रयोगशाला के समान है। पांच महीने पहले नीतीश कुमार ने एनडीए के मुख्यमंत्री के रूप में 80 प्रतिशत से अधिक सीटें जीती थीं। लेकिन अब उन्हें हटाने की चर्चा हो रही है, जिसका कारण उनकी स्वास्थ्य स्थिति बताई जा रही है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उनकी मानसिक सेहत के कारण उन्हें हटाया जा रहा है। कहा गया कि वे राज्यसभा जाना चाहते हैं, इसलिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे। लेकिन इस पर किसी ने विश्वास नहीं किया। उन्होंने राज्यसभा के लिए नामांकन भरा और चुनाव भी जीते। जब वे दोनों सदनों के सदस्य बन गए, तो 14 दिन के भीतर उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।
संविधान और मुख्यमंत्री की स्थिति
इससे एक संवैधानिक प्रश्न उठता है कि जब उन्होंने विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया, तो वे मुख्यमंत्री कैसे बने रह सकते हैं? संविधान का अनुच्छेद 164 स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि कोई व्यक्ति किसी सदन का सदस्य बने बिना मंत्री बनता है, तो उसे छह महीने का समय दिया जाएगा। लेकिन यह नहीं बताया गया है कि यदि कोई मुख्यमंत्री उस सदन की सदस्यता खो देता है, तो क्या होगा। यह स्पष्ट है कि संविधान निर्माताओं ने ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की होगी।
बिहार की जनता के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
नीतीश कुमार की राज्यसभा जाने की इच्छा और संवैधानिक प्रश्नों को छोड़कर, बिहार की 14 करोड़ की आबादी के लिए कई महत्वपूर्ण सवाल हैं। सबसे पहला सवाल यह है कि क्या बिहार में कोई खेल चल रहा है? यदि नीतीश कुमार की इतनी इच्छा है कि वे राज्यसभा जाना चाहते हैं, तो मुख्यमंत्री पद क्यों नहीं छोड़ते? वे राज्यसभा के लिए चुन लिए गए हैं और जब सभापति कहेंगे, तब उनकी शपथ होगी। लेकिन इससे पहले वे मुख्यमंत्री पद पर क्यों बने हुए हैं? पिछले एक महीने से यह स्थिति चल रही है।
बिहार की प्रशासनिक स्थिति
बिहार में सब कुछ ठप हो गया है। एक 'लेम डक' स्थिति बन गई है। कानूनी रूप से नहीं, लेकिन व्यावहारिक रूप से मुख्यमंत्री का कोई महत्व नहीं रह गया है। जब यह तय हो गया कि नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे, तो उनकी ऑथोरिटी समाप्त हो गई। मंत्रियों और अधिकारियों को निर्देश भेजने बंद हो गए हैं। क्या किसी को याद है कि बिहार में कब से कैबिनेट की बैठक नहीं हुई? डेढ़ महीने से अधिक समय हो गया है।
वित्तीय स्थिति और चुनावी घोषणाएँ
चुनाव से पहले बिहार सरकार ने खजाने का मुंह खोल दिया था। महिलाओं के खातों में पैसे भेजे गए, सामाजिक सुरक्षा पेंशन बढ़ाई गई, और बिजली मुफ्त देने की घोषणा की गई। इन सबका मिलाजुला असर यह हुआ कि बिहार का वित्तीय घाटा जीडीपी के नौ प्रतिशत तक पहुंच गया। यह स्थिति चिंताजनक है।
भविष्य की अनिश्चितता
विकास कार्य ठप हो गए हैं। नई सरकार बनने की उम्मीद थी, लेकिन खजाना खाली होने के कारण सब कुछ टाल दिया गया। कहा गया कि नए वित्त वर्ष से कामकाज शुरू होगा। लेकिन तब तक नीतीश कुमार के इस्तीफे का ड्रामा जारी है। यह स्थिति बिहार की जनता के लिए चिंताजनक है।
नीतीश कुमार का इस्तीफा
नीतीश कुमार ने 20 साल तक मुख्यमंत्री रहते हुए इस्तीफा देने में देरी की है। यह सवाल उठता है कि क्यों वे इस्तीफा नहीं दे रहे हैं? क्या उनके आस-पास के लोग बदलाव नहीं चाहते? क्या कोई दबाव है? भाजपा इस स्थिति से संतुष्ट है और चुपचाप तमाशा देख रही है।