बिहार में राज्यसभा चुनाव: राजनीतिक समीकरणों का नया मोड़
बिहार का चुनाव: राजनीतिक महत्व
राज्यसभा की 11 सीटों के लिए तीन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, लेकिन बिहार का चुनाव सबसे अधिक महत्वपूर्ण और दिलचस्प है। ओडिशा में निर्दलीय दिलीप रे की जीत का किसी पर खास असर नहीं पड़ेगा, और हरियाणा में सतीश नंदल की जीत भी राज्य की राजनीति को प्रभावित नहीं करेगी। हालांकि, अगर बिहार में राजद के अमरेंद्र धारी सिंह जीत जाते हैं, तो यह बिहार की राजनीतिक स्थिति को बदल सकता है। भाजपा को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।
बिहार में बहुमत का समीकरण
बिहार में इस बार बहुमत का गणित बहुत निकट है। नीतीश कुमार की पार्टी के पास 85 विधायक हैं, जबकि महागठबंधन के पास 35 विधायक हैं। इन दोनों का कुल आंकड़ा 120 है। अगर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम के पांच और बसपा के एक विधायक को जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा 126 तक पहुंचता है, जो बहुमत से चार अधिक है। दूसरी ओर, भाजपा के पास 89 विधायक हैं, और चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी के साथ मिलकर उनका आंकड़ा 117 तक पहुंचता है।
राज्यसभा चुनाव की रणनीति
राज्यसभा की पांच सीटों के चुनाव में एक सीट जीतने के लिए 41 वोटों की आवश्यकता है। एनडीए के चार उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित है, लेकिन पांचवें उम्मीदवार के लिए अतिरिक्त वोट जुटाना चुनौतीपूर्ण होगा। भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा को चौथा उम्मीदवार बनाया और शिवेश राम को पांचवां उम्मीदवार बनाया। शिवेश राम का मुकाबला राजद के अमरेंद्र धारी सिंह से होगा। यदि राजद और महागठबंधन एकजुट रहते हैं, तो समीकरण बदल सकते हैं।
चुनाव की तैयारी
भाजपा के सूत्रों का कहना है कि राजद के एडी सिंह को 35 वोटों तक सीमित रखना आवश्यक है। दूसरी ओर, राजद और कांग्रेस 41 वोट हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। तेजस्वी यादव एमआईएम को विधान परिषद की एक सीट देने के लिए भी तैयार हैं। चुनाव 16 मार्च को होगा, और नीतीश कुमार पहली बार राज्यसभा सांसद बनेंगे।