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बिहार में राज्यसभा चुनाव: सत्तारूढ़ और विपक्षी गठबंधन के बीच दबाव की राजनीति

बिहार में 16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर सत्तारूढ़ और विपक्षी गठबंधन के बीच दबाव की राजनीति चल रही है। विपक्ष के साझा उम्मीदवार अमरेंद्रधारी सिंह को जीतने के लिए छह वोटों की आवश्यकता है, जबकि भाजपा ने अपने चार उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित की है। जानें इस चुनाव में किस तरह की रणनीतियाँ अपनाई जा रही हैं और क्या परिणाम हो सकते हैं।
 

राज्यसभा चुनाव की तैयारियाँ

बिहार में 16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनाव को सत्तारूढ़ गठबंधन की दोनों पार्टियाँ एक-दूसरे पर दबाव डालने के लिए उपयोग कर रही हैं। वहीं, विपक्षी गठबंधन भी इसे अपनी राजनीतिक रणनीति के तहत दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। विपक्ष के साझा उम्मीदवार अमरेंद्रधारी सिंह हैं, जिनके पास केवल 35 विधायक हैं। उन्हें जीतने के लिए छह और वोटों की आवश्यकता है। यदि एमआईएम के वोट और बसपा के एकमात्र विधायक का समर्थन उन्हें मिलता है, तो उनकी जीत संभव है। विपक्ष की योजना है कि 41 का आंकड़ा दिखाकर भाजपा पर दबाव डाला जाए, क्योंकि यदि ये 41 नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यू के साथ मिल जाते हैं, तो उनकी संख्या 126 हो जाएगी, जो बहुमत से चार अधिक है।


वहीं, भाजपा ने अपने दम पर चार उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित की है। नीतीश कुमार, नितिन नबीन, रामनाथ ठाकुर और उपेंद्र कुशवाहा के लिए 164 वोट आवंटित किए गए हैं। भाजपा ने जानबूझकर अपने पार्टी के शिवेश राम को पांचवें उम्मीदवार के रूप में खड़ा किया है। उनके लिए तीन अतिरिक्त वोट जुटाने होंगे। भाजपा कम से कम पांच वोट जुटाने की योजना बना रही है ताकि नीतीश कुमार पर यह दबाव डाला जा सके कि वे बिना भाजपा के भी बहुमत का आंकड़ा पूरा कर सकते हैं। उल्लेखनीय है कि भाजपा के पास 89 विधायक हैं, और चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी को मिलाकर उनकी संख्या 117 हो जाती है। यदि वे पांच या छह विधायकों का समर्थन जुटा लेते हैं, तो उनकी संख्या 122 से ऊपर हो जाएगी।