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बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला: दवा कंपनियों को मिली राहत, मूल्य नियंत्रण से बाहर होंगी कई दवाएं

बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है, जिसके तहत कई आवश्यक दवाएं मूल्य नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी। यह निर्णय दवा कंपनियों के लिए एक न्यायिक सफलता है, जो 2013 से मूल्य नियंत्रण आदेश के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां मूल दवा में मामूली बदलाव कर नए संस्करण बनाती रही हैं। इस स्थिति के परिणामस्वरूप, सरकार को 2013 के आदेश की भाषा में सुधार करना आवश्यक है। जानें इस निर्णय का आम मरीजों पर क्या प्रभाव पड़ेगा और सरकार की जिम्मेदारी क्या है।
 

बॉम्बे हाई कोर्ट का निर्णय

यह कहना मुश्किल है कि दवा कंपनियों के लिए आवश्यक दवाओं के मामले में कोई नाइंसाफी नहीं है। फिर भी, दवा कंपनियों ने 2013 से मूल्य नियंत्रण आदेश के खिलाफ एक मोर्चा खोला हुआ है। हाल ही में, उन्हें एक न्यायिक सफलता प्राप्त हुई है।


न्यायालय का निर्णय

बॉम्बे हाई कोर्ट के एक निर्णय के अनुसार, कई आवश्यक दवाएं अब मूल्य नियंत्रण की श्रेणी से बाहर हो जाएंगी। अदालत ने औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश-2013 में मौजूद कुछ खामियों का लाभ दवा कंपनियों को दिया है। अदालत ने कहा कि उन दवाओं पर मूल्य संबंधी विनियम लागू नहीं होंगे, जिनका स्पष्ट उल्लेख इस आदेश में नहीं है। सरकार इसी आदेश के तहत आवश्यक औषधियों की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) बनाती है, जिनकी कीमतें मनमाने ढंग से नहीं बढ़ाई जा सकतीं।


दवा कंपनियों की रणनीति

विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां मूल दवा में मामूली बदलाव कर नए संस्करण बनाती रही हैं ताकि इस व्यवस्था को नाकाम किया जा सके। ये दवाएं अलग नाम से बाजार में उपलब्ध होती हैं। अब तक, सरकार 2013 के आदेश की भावना के अनुसार ऐसी दवाओं को एनएलईएम में शामिल करती आ रही थी। वर्तमान में, इस सूची में 348 दवाएं हैं, जिनके सभी संस्करण (खुराक मात्रा और शक्ति के अनुसार) शामिल हैं। अब यह स्थिति बदल सकती है।


सरकार की जिम्मेदारी

हालांकि सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प है, लेकिन यदि सर्वोच्च न्यायालय ने स्टे नहीं दिया, तो कई दवाएं आम उपभोक्ता की पहुंच से बाहर हो जाएंगी। इसलिए, यह आवश्यक है कि सरकार 2013 के आदेश की भाषा में सुधार करते हुए इसे नए सिरे से जारी करे। उल्लेखनीय है कि कंपनियों को एनएलईएम के तहत आने वाली दवाओं की कीमत साल में एक बार बढ़ाने का अधिकार 2013 के आदेश के तहत मिला है। वे पिछले वर्ष के थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर इनकी कीमतें बढ़ाती रही हैं। हालांकि, उन्हें इस वृद्धि का तर्क पेश करना पड़ता है, जिस पर सरकार की नजर रहती है। इसलिए, यह कहना गलत नहीं होगा कि दवा कंपनियों के मामले में कोई नाइंसाफी नहीं है। लेकिन, दवा कंपनियों ने 2013 से इस आदेश के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है। अब उन्हें एक न्यायिक सफलता मिली है। सरकार को यह याद रखना चाहिए कि आम मरीजों के अधिकारों की रक्षा करना उसकी जिम्मेदारी है।