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भारत का कॉमनवेल्थ में स्थान: इतिहास और महत्व

भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में चौथा स्थान हासिल कर सभी को चौंका दिया है। इस लेख में जानें कि कैसे भारत ने कॉमनवेल्थ का हिस्सा बनने के बाद अपनी संप्रभुता को बनाए रखा और इसके महत्व को समझें। जानिए किंग चार्ल्स की भूमिका, भारत की सदस्यता का इतिहास और चीन का कॉमनवेल्थ में न होना।
 

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की सफलता

भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में चौथा स्थान हासिल कर सभी को चौंका दिया है। इस बार भारत ने रेसलिंग, बैडमिंटन, हॉकी और क्रिकेट जैसे खेलों में भाग नहीं लिया, फिर भी अन्य खेलों में शानदार प्रदर्शन किया। यह प्रतियोगिता ग्लासगो में आयोजित हो रही है, जहां भारत ने अब तक 6 स्वर्ण सहित कुल 39 पदक जीते हैं। इन खेलों की मेज़बानी ब्रिटेन कर रहा है, और ब्रिटेन के राजा इस आयोजन के अध्यक्ष हैं।


ब्रिटेन के किंग का भूमिका

किंग चार्ल्स खेलों के प्रमुख संरक्षक और प्रतीकात्मक नेता हैं। वे खेलों की शुरुआत से पहले पारंपरिक 'किंग्स बेटन रिले' को रवाना करते हैं और उद्घाटन समारोह में विशेष संदेश पढ़कर खेलों की औपचारिक शुरुआत की घोषणा करते हैं। हालांकि, यह प्रथा कुछ लोगों को खटकती है, जो मानते हैं कि यह अवसर सभी राष्ट्रों के प्रतिनिधियों को मिलना चाहिए। भारत इस पर कोई आपत्ति नहीं करता है, फिर भी यह जानना आवश्यक है कि भारत कॉमनवेल्थ का हिस्सा क्यों है।


भारत का कॉमनवेल्थ में शामिल होना

भारत ने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की और उसी समय यह घोषणा की गई कि भारत एक गणतंत्र बनेगा। भारत ने कॉमनवेल्थ का सदस्य बने रहने की इच्छा व्यक्त की। इस मुद्दे को सुलझाने के लिए 1949 में लंदन में कॉमनवेल्थ देशों के प्रधानमंत्रियों की बैठक हुई, जिसमें 'लंदन डिक्लेरेशन' का एलान किया गया। इस डिक्लेरेशन के अनुसार, गणतंत्र देश भी कॉमनवेल्थ का हिस्सा बन सकते हैं।


भारत की संप्रभुता की रक्षा

लंदन डिक्लेरेशन के तहत, भारत ने यह स्पष्ट किया कि वह स्वतंत्र गणराज्य बनेगा और किसी भी प्रकार की निर्भरता स्वीकार नहीं करेगा। जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा था कि भारत अपनी विदेश, आंतरिक, राजनीतिक या आर्थिक नीतियों में स्वतंत्र रहेगा। इस प्रकार, भारत ने ब्रिटिश राजा को कॉमनवेल्थ के स्वतंत्र देशों के संघ का प्रतीक मानने पर सहमति जताई।


भारत का कॉमनवेल्थ में योगदान

भारत के प्रस्ताव के आधार पर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान और श्रीलंका ने भी अपने नियम बनाए। यह डिक्लेरेशन जवाहरलाल नेहरू के सलाहकार वीके मेनन और ब्रिटेन के कैबिनेट सचिव नॉर्मन ब्रुक की अगुवाई में हुआ। पहले इसे 'ब्रिटिश कॉमनवेल्थ' कहा जाता था, लेकिन अब इसे 'कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस' कहा जाता है।


भारत की सदस्यता का महत्व

जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि भारत कॉमनवेल्थ का हिस्सा इसलिए है क्योंकि यह हमारे लिए और विश्व में उन उद्देश्यों के लिए लाभदायक है जिन्हें हम आगे बढ़ाना चाहते हैं। भारत का संबंध किंग से मित्रता और समानता का रहा है, न कि अधीनता का।


चीन का कॉमनवेल्थ में न होना

चीन कभी भी ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं रहा और इसलिए यह कॉमनवेल्थ का सदस्य नहीं है। चीन ने अपने राजनीतिक विचारधारा के अनुसार अलग राह चुनी है और वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है।


भारत की सदस्यता पर सवाल

भारत के कुछ राष्ट्रवादी यह मानते हैं कि ब्रिटिश सम्राट को कॉमनवेल्थ के प्रमुख के रूप में मान्यता क्यों दी जाए। वे चाहते हैं कि कॉमनवेल्थ की अध्यक्षता विभिन्न देशों को मिले।


भारत का कॉमनवेल्थ में बने रहना

भारत का कॉमनवेल्थ में होना उसके लिए फायदेमंद है। भारत स्वतंत्र है और अपनी नीतियों को खुद तय करता है। भारत की सैन्य शक्ति और अर्थव्यवस्था ब्रिटेन से कहीं अधिक मजबूत है।