भारत की उपग्रह महत्त्वाकांक्षा को झटका: पीएसएलवी की दो नाकामियां
भारत की उपग्रह लॉन्चिंग में विश्वास संकट
भारत ने उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के क्षेत्र में अग्रणी बनने का लक्ष्य रखा है, लेकिन हाल की दो विफलताओं ने इस परियोजना पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पीएसएलवी रॉकेट की 62वीं उड़ान की असफलता ने भारत की उपग्रह संबंधी महत्वाकांक्षाओं को गंभीर चोट पहुंचाई है। यह स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि पिछले वर्ष मई में पीएसएलवी की 61वीं उड़ान भी सफल नहीं हो पाई थी। सोमवार को, पीएसएलवी-सी62 ने 16 उपग्रहों के साथ उड़ान भरी, लेकिन उड़ान के तीसरे चरण में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का संपर्क टूट गया। इसरो को यह भी नहीं पता चल सका कि उपग्रह कहां गए। यह वही समस्या थी जो पीएसएलवी-सी61-ईओएस-09 के साथ भी हुई थी। इसका मतलब है कि इसरो के वैज्ञानिक पिछले सात महीनों में उस तकनीकी खामी को ठीक नहीं कर सके, जिसके कारण मई में उनका मिशन विफल हुआ था। इस विफलता की जांच के लिए एक समिति बनाई गई थी, जिसकी रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी गई, लेकिन इसे गोपनीय रखा गया है।
इसका मतलब है कि करदाताओं के पैसे से चलने वाले इसरो को इस बात की जानकारी नहीं दी गई कि उनका पैसा क्यों बर्बाद हुआ। अब एक बार फिर ऐसी ही घटना बड़े पैमाने पर हुई है। भारत ने उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने के क्षेत्र में अग्रणी बनने का सपना देखा था, लेकिन अब लगातार दो विफलताओं के बाद इस रॉकेट लॉन्च के लिए बीमा की लागत बढ़ने की संभावना है। इससे उन देशों या कंपनियों के लिए इसरो से ठेका लेना महंगा हो जाएगा, जो अपने उपग्रह भेजना चाहती हैं।
इस विश्वास संकट का समाधान पारदर्शिता में है। भारत सरकार और इसरो को चाहिए कि वे इन विफलताओं के बारे में सभी संबंधित पक्षों को जानकारी दें। नाकामियों के लिए जिम्मेदारी तय करना भी आवश्यक है। आखिरकार, बिना पुरानी खामी को ठीक किए अगले लॉन्च को हरी झंडी कैसे दी गई, यह जानकारी देश को मिलनी चाहिए। पीएसएलवी-सी62 में डीआरडीओ का अन्वेषण उपग्रह भी शामिल था, जिसका मतलब है कि इस विफलता का असर भारत की रक्षा तैयारियों पर भी पड़ेगा। इसलिए इस मामले में पूरी जांच और पारदर्शिता अनिवार्य है।