×

भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर संकट: रूस से मदद की उम्मीद

भारत की ऊर्जा सुरक्षा गंभीर संकट में है, खासकर हार्मुज जलडमरूमध्य में चल रहे संघर्षों के कारण। देश की रिफाइनरियों में तेल का भंडार खतरनाक स्तर तक गिर गया है। रूस ने भारत की मदद का प्रस्ताव दिया है, जिससे भारत की कुल तेल जरूरतों का 40 प्रतिशत पूरा किया जा सकता है। हालांकि, भारत की सीमित भंडारण क्षमता और अमेरिका का कूटनीतिक दबाव स्थिति को और जटिल बना रहा है। जानें इस संकट का समाधान कैसे निकाला जा सकता है और भविष्य में ऊर्जा साझेदारी की संभावनाएं क्या हैं।
 

भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ता दबाव


नई दिल्ली: वैश्विक भू-राजनीतिक परिवर्तनों ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को गंभीर चुनौती दी है। देश की रिफाइनरियों में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी का भंडार चिंताजनक स्तर तक गिर गया है। हार्मुज जलडमरूमध्य में चल रहे संघर्षों ने खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति को लगभग रोक दिया है। भारत प्रतिदिन 5.6 मिलियन बैरल तेल का रिफाइनिंग करता है, और सरकार अगले 10 से 15 दिनों में नए और सुरक्षित आपूर्ति मार्ग खोजने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास कर रही है।


हार्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति

हार्मुज जलडमरूमध्य, जो विश्व का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है, हालिया संघर्षों के कारण जहाजों के लिए लगभग असुरक्षित हो गया है। भारत अपनी आवश्यकताओं का लगभग 40 प्रतिशत कच्चा तेल इसी मार्ग से प्राप्त करता है। वर्तमान में यह मार्ग बंद जैसी स्थिति में है, जिससे देश की ऊर्जा निर्भरता को बड़ा झटका लगा है। सरकार अब वैकल्पिक समुद्री मार्गों पर विचार कर रही है ताकि तेल आपूर्ति चेन को बनाए रखा जा सके।


रूस की सहायता और संभावनाएं

रूस की बड़ी पेशकश: संकट के इस समय में, रूस ने भारत की मदद का प्रस्ताव दिया है। रूस भारत की कुल तेल जरूरतों का 40 प्रतिशत पूरा करने के लिए तैयार है। उद्योग के सूत्रों के अनुसार, रूसी तेल से लदे जहाज भारतीय समुद्री सीमा के निकट हैं और जल्दी ही यहां पहुंच सकते हैं। पहले ये जहाज अन्य देशों के लिए जा रहे थे, लेकिन अब भारत की आपात जरूरतों को देखते हुए रूस इन्हें प्राथमिकता दे सकता है।


भारत की भंडारण क्षमता की चुनौतियाँ

कमजोर भंडारण क्षमता: भारत की सबसे बड़ी चिंता इसकी सीमित तेल भंडारण क्षमता है। वर्तमान में, देश के पास केवल 25 दिनों की मांग पूरी करने के लिए स्टॉक बचा है। चीन जैसे देशों की तुलना में भारत का तेल भंडार काफी कम है, जिससे वैश्विक बाधाओं का सीधा असर घरेलू बाजार और कीमतों पर पड़ता है। यदि 15 दिनों के भीतर वैकल्पिक स्रोत नहीं मिले, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। भारतीय रिफाइनरियां लगातार रूसी व्यापारियों के संपर्क में हैं।


अमेरिका का कूटनीतिक दबाव

अमेरिकी दबाव: रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिका का दबाव भी बना हुआ है। पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि भारत रूसी तेल खरीदना बंद कर देगा, लेकिन भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेगा। ट्रंप ने यह भी आश्वासन दिया है कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी नौसेना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए तैनात की जा सकती है। यह कूटनीतिक स्थिति भारत के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है।


भविष्य की ऊर्जा साझेदारी

गैस आपूर्ति की स्थिति: कतर द्वारा उत्पादन में कटौती के बाद, भारत में एलपीजी और एलएनजी की भारी कमी हो गई है। रूस अब भारत को तरल प्राकृतिक गैस बेचने का विकल्प भी दे रहा है। घरेलू स्तर पर कुछ औद्योगिक ग्राहकों की गैस सप्लाई पहले ही कम कर दी गई है। हालांकि, अब रूसी तेल की कीमतें वैश्विक बाजार में बढ़ती मांग के कारण कम नहीं रहेंगी। भारत और रूस मिलकर अपनी ऊर्जा साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं ताकि भविष्य में किसी भी संकट का सामना किया जा सके।