भारत की वर्तमान स्थिति: एक चिंतनशील दृष्टिकोण
सोवियत संघ की याद दिलाती भारतीय स्थिति
1970 के दशक में सोवियत संघ की स्थिति की याद दिलाने वाली हालात भारत में भी देखने को मिल रही हैं। उस समय के नेताओं ने अपने देश को भ्रमित करने के लिए नियमित रूप से झूठ का सहारा लिया। आलोचना या स्थिति की जांच का कोई स्थान नहीं था, जिसके परिणामस्वरूप नेता खुद अपने प्रोपेगंडा का शिकार बन गए। जब झूठी नीतियों की विफलता का सामना करना पड़ा, तब वे असहाय साबित हुए। यह स्थिति सोवियत संघ के विघटन (1991) का कारण बनी।
भारत में भी समाज, संस्कृति, नैतिकता, शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्थिति में गिरावट आ रही है, जबकि जिम्मेदार लोग ऊँची-ऊँची बातें कर रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, पिछले साल 'आपरेशन सिंदूर' एक बड़ी भूल साबित हुई। इसने पहलगाम में आंतरिक जिहाद को केवल पाकिस्तानी गतिविधि बताकर, पाकिस्तान पर हमला किया और फिर अचानक इसे रोक दिया। यह स्पष्ट हो गया कि बचे-खुचे कश्मीरी हिंदुओं को वहां से भागने का नोटिस मिला, जो कि देसी मुस्लिमों द्वारा किया गया।
यह असली समस्याओं से मुँह चुराने का एक उदाहरण है। इस्लामी उग्रवाद और विस्तारवाद को पाकिस्तान की करतूत बताकर अपनी जिम्मेदारी छिपाना। इसी तरह अन्य समस्याओं में भी लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की जा रही है, जो अक्सर सफल भी होती है। लेकिन यह स्थिति कब तक चलेगी?
असलियत यह है कि भारत की उस भूल के बाद पाकिस्तान की स्थिति में अचानक सुधार हुआ। उसे अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति मिली और अमेरिकी, अरब, तुर्क सहयोग से उसकी ताकत बढ़ी। शासकों में सूझ-बूझ की कमी के कारण यह हुआ। वे एक ही तरह की घटनाओं पर अलग-अलग प्रतिक्रिया देते हैं या चुप रहते हैं।
ईमानदारी और गुणवत्ता पर अब और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। नियुक्तियों में योग्यता को महत्वहीन बना दिया गया है; अनावश्यक निर्माणों की भरमार है; मीडिया को पंगु बना दिया गया है; चुनावी खर्च में जानबूझकर वृद्धि की जा रही है।
इससे विद्वानों की स्थिति भी दयनीय हो गई है। उन्हें कोई स्थान नहीं मिल रहा है जहाँ वे अपनी जानकारी और अनुभव साझा कर सकें। दूसरी ओर, मेधावी विद्यार्थी भी केवल प्रोपेगंडा सुन रहे हैं। इस तरह, शिक्षक और विद्यार्थी दोनों असहाय हैं।
संघ परिवार ने रामनाथ गोयनका के अविश्वास को सही साबित किया। उन्होंने चार दशक पहले कहा था कि संघ परिवार के नेताओं की 'सादगी' पर विश्वास मत करो, क्योंकि 'अभी उनके पास सादगी के सिवा कुछ नहीं है।'
इसलिए अब 'चाल, चरित्र, चेहरा' का मुहावरा कोई संघ-भाजपा नेता नहीं दोहराता। सबको पता है कि यह केवल प्रचार के लिए था। चरित्र के मामले में सभी दल लगभग समान हैं। मुख्य लड़ाई केवल लूट की राजनीति में अपने हिस्से की है।
अकादमिक बौद्धिक जगत की स्थिति भी चिंताजनक है। भारतीय भाषा-साहित्य की हालत, प्रमाणपत्रों की असली मूल्यवत्ता, और शिक्षा के उद्देश्य सभी प्रभावित हो रहे हैं।
आज देश में कोई भी अखिल भारतीय पहचान वाली अकादमिक या साहित्य पत्रिका नहीं रह गई है। यह स्थिति भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए अत्यंत चिंताजनक है।
इस प्रकार, भारत की वर्तमान स्थिति सोवियत संघ की याद दिलाती है, जहाँ नेता अपने देश को भ्रमित करने में लगे थे। आज भारतीय समाज भी उसी आत्म-प्रवंचना का शिकार हो रहा है।