भारत की शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता: परीक्षा की चुनौतियाँ और छात्र आत्महत्या
शिक्षा प्रणाली की समस्याएँ
भारत में शिक्षा प्रणाली और परीक्षा की व्यवस्था पर हाल ही में व्यापक चर्चा हो रही है। यह बहस तब शुरू हुई जब मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट यूजी के प्रश्न पत्र लीक हो गए, जिसके कारण परीक्षा को पुनः आयोजित करना पड़ा। अब यह परीक्षा 21 जून को होगी, लेकिन इससे पहले ही 12 छात्रों ने आत्महत्या कर ली है। सीबीएसई द्वारा लागू किए गए ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में भी कई समस्याएँ सामने आई हैं। ये घटनाएँ भारत की शिक्षा व्यवस्था की गंभीरता को दर्शाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक देश, एक परीक्षा के सिद्धांत के तहत सभी मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं को एक साथ आयोजित करने का निर्णय लिया, जिसके लिए एनटीए का गठन किया गया। इस एजेंसी की विफलताओं के कारण सेना और वायु सेना को भी नीट यूजी परीक्षा में शामिल होना पड़ा।
राज्य स्तर पर समान समस्याएँ
हर राज्य में शिक्षा और परीक्षा से संबंधित समस्याएँ समान हैं। समय पर शिक्षा सत्र का संचालन न होना, परीक्षा का समय पर न होना, और परिणामों की देरी जैसी समस्याएँ आम हैं। उदाहरण के लिए, बिहार में 70वीं बीपीएससी परीक्षा के परिणाम अभी तक घोषित नहीं हुए हैं, जिससे लाखों छात्र अगली परीक्षा तक उम्र की सीमा पार कर जाएंगे। इसी तरह, दिल्ली में सीयूईटी परीक्षा में तकनीकी गड़बड़ी के कारण 3600 से अधिक छात्रों को परीक्षा में शामिल नहीं होने दिया गया।
परीक्षा का व्यवसायीकरण
परीक्षा का आयोजन अब सरकारों और एजेंसियों के लिए आय का स्रोत बन गया है। बेरोजगारी के कारण एक नौकरी के लिए हजारों आवेदन आते हैं। बिहार में एक नौकरी के लिए 14 लाख लोगों ने आवेदन किया। ऐसे में परीक्षा केंद्रों की दूरी और यातायात की कमी छात्रों के लिए बड़ी समस्या बन गई है। हाल ही में रेलवे स्टेशनों पर छात्रों की भीड़ की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं।
आर्थिक और मानसिक शोषण
प्रतियोगी परीक्षाएँ अब छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए आर्थिक, शारीरिक और मानसिक शोषण का प्रतीक बन गई हैं। राहुल गांधी ने हाल ही में छात्रों के साथ संवाद में एक आंकड़ा प्रस्तुत किया, जिसमें बताया गया कि देश की पांच प्रमुख परीक्षाओं की तैयारी में छात्रों का साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये खर्च होता है। यह राशि बिहार के वार्षिक बजट से अधिक है।
शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट
शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट एक गंभीर मुद्दा है। कोरोना के बाद हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि प्राथमिक स्तर पर बच्चों की सीखने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है। उच्च शिक्षा और अनुसंधान की स्थिति भी चिंताजनक है। हाल ही में जारी क्यूएस रैंकिंग में भारत की कोई भी विश्वविद्यालय शीर्ष 100 में नहीं है।