भारत की स्थिति: विश्वगुरु या महाशक्ति?
प्रधानमंत्री की निर्णयात्मक क्षमता
एक प्रधानमंत्री का मानना है कि उनकी निर्णय लेने की क्षमता अद्वितीय और सटीक है। इसलिए, वे बिना किसी सलाह-मशविरा के निर्णय लेते हैं और उन निर्णयों को सभी पर थोप देते हैं। उन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि उनके फैसले का क्या अर्थ है और लोग क्या सोचेंगे।
भारत की स्थिति पर सवाल
क्या भारत वास्तव में विश्वगुरु बन गया है? क्या यह महाशक्ति है? क्या यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है? क्या भारत में अमृत काल आ गया है? क्या यह लोक कल्याण के मार्ग पर अग्रसर है? क्या अच्छे दिन आ गए हैं?
विभिन्न दृष्टिकोण
जो लोग इन सवालों के जवाब में ‘नहीं’ देंगे, वे दिलजले हैं। वहीं, जो लोग ‘हां’ कहेंगे, वे अपने दिल की बात कह रहे हैं। इस स्थिति में, हम क्या करें? ‘हां’ कहें तो असत्य बोलने का पाप लगेगा और ‘नहीं’ कहें तो देशद्रोही का कलंक।
भारत की जटिलता
मुझे लगता है कि भारत विश्वगुरु बन भी गया है और नहीं भी। यह महाशक्ति बन भी गया है और नहीं भी। यह चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन भी गया है और नहीं भी। यह लोक कल्याण के मार्ग पर चल भी रहा है और नहीं भी।
निर्णय न लेना भी एक निर्णय
नब्बे के दशक में एक प्रधानमंत्री ने कभी निर्णय नहीं लिया, और जब उनके सामने मुद्दे रखे गए, तो उन्होंने कहा कि निर्णय न लेना भी एक निर्णय है। आज भी, एक प्रधानमंत्री का मानना है कि उनकी निर्णयात्मक क्षमता अद्वितीय है।
निर्णय और वास्तविकता
निर्णय लिया गया है कि भारत विश्वगुरु है, महाशक्ति है, और अच्छे दिन आ चुके हैं। आपको इन निर्णयों को मानना होगा, क्योंकि प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम अब सेवा तीर्थ है।
सवाल उठाने वाले
जो लोग सवाल उठाते हैं कि अगर भारत विश्वगुरु है तो अन्य देश क्यों आलोचना कर रहे हैं, वे राष्ट्रविरोधी हैं। जो यह पूछते हैं कि अगर भारत महाशक्ति है तो अमेरिका के राष्ट्रपति को जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा, वे मनोव्यथाग्रसित हैं।
आगे की दिशा
इस सब के बावजूद, जब एक-के-बाद-एक प्रदेश हिंदुत्वमय हो रहे हैं, तो आगे क्या होगा? इसलिए, जो बताया जा रहा है, उसे चुपचाप मान लीजिए। नहीं मानेंगे तो कर क्या लेंगे?