भारत के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी: नीति आयोग की रिपोर्ट
शिक्षा का नारा और वास्तविकता
भारत में शिक्षा विभाग का मूल मंत्र है, 'सब पढ़ें, सब बढ़ें', लेकिन देश के हजारों सरकारी स्कूल अभी भी आवश्यक सुविधाओं से वंचित हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1,04,125 स्कूल केवल एक शिक्षक पर निर्भर हैं, जिनमें से 89 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं।
शौचालयों की कमी
रिपोर्ट में बताया गया है कि 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए उपयुक्त शौचालय नहीं हैं, जबकि 61,540 स्कूलों में कोई भी शौचालय नहीं है। इसके अलावा, 1,19,000 स्कूल अभी भी बिना बिजली के कार्यरत हैं।
पानी की सुविधा का अभाव
नीति आयोग ने यह भी बताया कि 14,505 स्कूलों में पानी की सुविधा नहीं है और लगभग 60,000 स्कूलों में हाथ धोने की व्यवस्था भी नहीं है। माध्यमिक स्कूलों में केवल 51.7 प्रतिशत स्कूलों में विज्ञान प्रयोगशाला उपलब्ध है।
शिक्षकों की कमी
बिहार में सबसे अधिक 2,08,784 प्राथमिक शिक्षक पद रिक्त हैं। झारखंड और मध्य प्रदेश में भी हजारों पद खाली पड़े हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि गणित में केवल 2 प्रतिशत शिक्षक 70 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त कर सकते हैं, जबकि औसत स्कोर केवल 46 प्रतिशत है।
छात्रों की कमी
शिक्षक अपने 14 प्रतिशत कार्यदिवस गैर-शैक्षणिक कार्यों जैसे चुनाव ड्यूटी और सर्वेक्षण में व्यतीत करते हैं। देशभर में 7,993 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी छात्र नहीं है। पश्चिम बंगाल में 3,812 और तेलंगाना में 2,245 स्कूल बिना छात्रों के हैं।
स्कूल ड्रॉपआउट की समस्या
भारत में स्कूल ड्रॉपआउट की समस्या भी गंभीर है। माध्यमिक स्तर पर औसतन 11.5 प्रतिशत बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 20 प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश में 18.3 प्रतिशत, कर्नाटक में 18.3 प्रतिशत और असम में 17.5 प्रतिशत है।
बच्चों के लिए बैठने की व्यवस्था
नीति आयोग की रिपोर्ट के अलावा, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी स्कूलों में बच्चों के लिए बैठने की उचित व्यवस्था नहीं है। बच्चे आज भी चटाई और फर्श पर बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं, जबकि शिक्षकों के लिए अलग रूम और बैठने की व्यवस्था है। सिद्धार्थनगर, गोरखपुर, बस्ती और देवरिया के कई स्कूलों में यही स्थिति है।
शिक्षा पर खर्च
भारत अपने जीडीपी का केवल 4.6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश इस पर अधिक खर्च करते हैं।