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भारत को कार्यशील हवाई अड्डों की आवश्यकता है, न कि खाली रनवे की

भारत में हवाई अड्डों की स्थिति पर एक गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। क्या हमें अधिक हवाई अड्डों की आवश्यकता है या हमें कार्यशीलता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए? कई नए हवाई अड्डे वीरान पड़े हैं, जबकि रखरखाव का खर्च आय से अधिक हो गया है। जानें कि सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए और इस स्थिति को सुधारने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं।
 

हवाई अड्डों की स्थिति पर गंभीरता से विचार


भारत को केवल कार्यशील हवाई अड्डों की आवश्यकता है, खाली रनवे पर खर्च करना विकास नहीं, बल्कि बर्बादी है। जब रखरखाव का खर्च आय से अधिक हो जाता है, तो नीति में गर्व नहीं, सुधार की आवश्यकता होती है। सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए, अन्यथा अगले दस वर्षों में और सौ हवाई अड्डे बनेंगे, जिनमें से कई फिर से वीरान रहेंगे।


पिछले एक दशक में भारत में क्षेत्रीय हवाई संपर्क को बढ़ावा देने के लिए कई छोटे शहरों में टर्मिनल बनाए गए हैं। 'उड़े देश का आम नागरिक' योजना का उद्देश्य था कि टियर-2 और टियर-3 शहर भी हवाई नक्शे पर आ जाएं। हालांकि, आंकड़ों में सफलता दिखती है, लेकिन वास्तविकता में कई नए हवाई अड्डे और पुरानी पट्टियां आज वीरान पड़ी हैं।


संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, उड़ान योजना के तहत विकसित लगभग पंद्रह हवाई अड्डे वर्तमान में अनुसूचित उड़ानों से रहित हैं। इनमें पठानकोट, लुधियाना, शिमला, पाकयोंग, कुशीनगर, अलीगढ़, आजमगढ़, चित्रकूट, श्रावस्ती, मुरादाबाद, भावनगर, अंबिकापुर, राउरकेला, दतिया और कलबुर्गी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश सबसे अधिक प्रभावित राज्य है, जहां 2021 के बाद शुरू हुए सात नए एयरपोर्ट में से छह पर नियमित व्यावसायिक उड़ानें बंद हो चुकी हैं।


असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण खर्च और आय का अंतर है। सरकार ने इन पंद्रह हवाई अड्डों के रखरखाव पर लगभग 879 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जबकि वहां नियमित यात्री सेवा नहीं है। उदाहरण के लिए, पाकयोंग का निर्माण लगभग 605 करोड़ में हुआ था, और अब तक इसके रखरखाव पर लगभग 179 करोड़ खर्च हो चुके हैं।


इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। पहला, मांग का गलत आकलन। हवाई अड्डा बनाने से मांग अपने आप नहीं बनती। छोटे शहरों में रेल और सड़क पहले से सस्ती और भरोसेमंद हैं। दूसरा, विमान और ऑपरेटर की कमी। क्षेत्रीय उड़ानों के लिए छोटे विमानों की आवश्यकता होती है, लेकिन कई ऑपरेटर बंद हो गए हैं। तीसरा, तकनीकी सीमाएं। कई छोटे हवाई अड्डे केवल विजुअल फ्लाइट रूल्स पर चलते हैं, जिससे सर्दियों में उड़ानें रुक जाती हैं।


सरकार को इस स्थिति को सुधारने के लिए कई कदम उठाने चाहिए। नए हवाई अड्डों के निर्माण से पहले कठोर अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए। इसके अलावा, सब्सिडी की अवधि को बढ़ाया जा सकता है, और छोटे हवाई अड्डों को केवल यात्री पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।


भारत को अधिक हवाई अड्डों की नहीं, बल्कि कार्यशील हवाई अड्डों की आवश्यकता है। खाली रनवे पर खर्च करना विकास नहीं, बल्कि बर्बादी है।