×

भारत-चीन व्यापार लिपुलेख दर्रे से फिर से शुरू होने जा रहा है

भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे से व्यापार छह साल बाद फिर से शुरू होने जा रहा है। यह व्यापार सत्र आमतौर पर जून से सितंबर तक चलता है। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने बताया कि केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुसार तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। जानें इस व्यापार के ऐतिहासिक महत्व और पिछले वर्षों में इसके आंकड़ों के बारे में।
 

भारत-चीन व्यापार का पुनरारंभ


2019 में गलवान झड़प के बाद व्यापार बंद हुआ था, जून से सितंबर के बीच होती है ट्रेडिंग


उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख दर्रे के माध्यम से भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार छह साल बाद फिर से शुरू होने वाला है। यह व्यापार सत्र आमतौर पर जून से सितंबर तक चलता है। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट आशीष भटगाई ने बताया कि केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुसार तैयारियां आरंभ कर दी गई हैं। विदेश मंत्रालय द्वारा नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट जारी होने के बाद यह प्रक्रिया आगे बढ़ी है।


लिपुलेख दर्रे के माध्यम से तिब्बत के साथ सीमा व्यापार 1992 में लंबे अंतराल के बाद फिर से शुरू हुआ था। हालांकि, 2019 में कोविड-19 महामारी और गलवान झड़प के कारण इसे बंद कर दिया गया था। पिछले साल 18-19 अगस्त को चीनी विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान भारत-चीन ने रुपये और युआन में व्यापार करने का निर्णय लिया था। अब तक यह वस्तु विनिमय आधारित था, यानी सामान के बदले सामान का लेन-देन होता था।


ब्रिटिश काल में लिपुलेख दर्रे का महत्व

ब्रिटिश काल में भी लिपुलेख दर्रा व्यापार और तीर्थयात्रा का प्रमुख केंद्र था


ब्रिटिश काल में लिपुलेख दर्रा व्यापार और तीर्थयात्रा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। तिब्बत से व्यापारी नमक, बोराक्स, पशु उत्पाद, जड़ी-बूटियां और स्थानीय सामान बेचने आते थे, जबकि भारतीय व्यापारी बकरियां, भेड़ें, अनाज, मसाले, गुड़, मिश्री और गेहूं वहां ले जाते थे। भारत-चीन के बीच साल 2005 में 12 करोड़ रुपये का आयात और 39 लाख रुपये का निर्यात हुआ था। साल 2018 में 5.59 करोड़ रुपये का आयात और 96.5 लाख रुपये का निर्यात हुआ था।