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भारत ने पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र में दिया करारा जवाब, आतंकवाद पर उठाए सवाल

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के निराधार आरोपों का कड़ा जवाब दिया है। प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने पाकिस्तान को 'फ्रेंकस्टीन देश' कहा और उसकी आंतरिक स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने आतंकवाद पर पाकिस्तान की दोहरी नीति को उजागर किया और सिंधु जल संधि पर भारत का स्पष्ट रुख भी बताया। जानें इस महत्वपूर्ण वार्ता के बारे में और क्या कहा गया।
 

भारत की सख्त प्रतिक्रिया


नई दिल्ली: भारत ने एक बार फिर से संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के निराधार आरोपों का जवाब देते हुए उसे कड़ी चेतावनी दी है। जब पाकिस्तान और इस्लामिक सहयोग संगठन ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को उठाने की कोशिश की, तब भारत ने अपने 'राइट टू रिप्लाई' का उपयोग करते हुए इस्लामाबाद को उसकी वास्तविकता दिखाई।


अनुपमा सिंह की तीखी टिप्पणी

भारत की प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने पाकिस्तान पर तीखा प्रहार करते हुए उसे 'फ्रेंकस्टीन देश' करार दिया, जो अपने ही पाले हुए आतंकवाद से जूझ रहा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अपने आंतरिक मामलों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और अपने नागरिकों की भलाई के लिए काम करना चाहिए।


पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति पर सवाल

अनुपमा सिंह ने पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वहां बुनियादी स्वतंत्रताओं का उल्लंघन बढ़ रहा है। जब लोग अपने अधिकारों और गरिमा की मांग करते हैं, तो उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ता है। उन्होंने पाकिस्तान से कहा कि उसे भारतीय क्षेत्रों की लालसा छोड़कर अपने देश की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, और यदि कोई मुद्दा है, तो वह केवल पाकिस्तान द्वारा किए गए अवैध कब्जे का है।


आतंकवाद पर पाकिस्तान की दोहरी नीति

भारतीय राजनयिक ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के पूर्व बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि पाकिस्तान के नेता गर्व से स्वीकार करते हैं कि आतंकवाद उनकी सरकारी नीति का हिस्सा है, जबकि वे खुद को पीड़ित के रूप में पेश करते हैं।


सिंधु जल संधि पर भारत का स्पष्ट रुख

भारत ने सिंधु जल संधि पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। 1960 की इस संधि को 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद निलंबित कर दिया गया था। भारत ने कहा कि कोई भी तकनीकी व्यवस्था स्थायी नहीं रह सकती जब उसके चारों ओर की स्थिति बदल रही हो। आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला देश मित्रता और सहयोग के आधार पर विशेष अधिकारों की मांग नहीं कर सकता।