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भारत में कचरा प्रबंधन: सर्कुलर इकोनॉमी की आवश्यकता

भारत में कचरा प्रबंधन एक गंभीर चुनौती बन चुका है, जहां नागरिकों में स्रोत पर कचरा अलग करने की आदत कमजोर है। 'स्वच्छ भारत अभियान' ने स्वच्छता में सुधार किया है, लेकिन ठोस कचरा प्रबंधन की स्थिति चिंताजनक है। सर्कुलर इकोनॉमी को अपनाने की आवश्यकता है, जिससे कचरे को संसाधन में बदला जा सके। जानें कैसे यह मॉडल रोजगार पैदा कर सकता है और पर्यावरण को सुधार सकता है।
 

कचरा प्रबंधन की चुनौतियाँ


भारत में नागरिकों के बीच कचरा स्रोत पर अलग करने की आदत अभी भी कमजोर है। जब घरेलू स्तर पर गीला और सूखा कचरा एक साथ होता है, तो रीसाइक्लिंग और कंपोस्टिंग की प्रक्रिया में बाधा आती है। इसके अलावा, नगरपालिकाओं की क्षमता को बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि उन्हें पर्याप्त फंडिंग, स्टाफ और तकनीकी सहायता मिले। लीगेसी डंपसाइट्स की सफाई आवश्यक है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि नया कचरा वहां न पहुंचे।


भारत प्रतिदिन करोड़ों टन कचरा उत्पन्न करता है। शहरी क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट की मात्रा लगातार बढ़ रही है, जबकि ग्रामीण इलाकों में भी प्लास्टिक और अन्य कचरे का ढेर लगा हुआ है। 2014 में शुरू हुए 'स्वच्छ भारत अभियान' ने स्वच्छता में महत्वपूर्ण बदलाव लाने का प्रयास किया, लेकिन ठोस कचरा प्रबंधन के बिना इसकी सफलता अधूरी रही है। पर्यावरण और जनहित के दृष्टिकोण से, अब हमें रैखिक मॉडल (उत्पादन-उपयोग-फेंकना) से आगे बढ़कर सर्कुलर इकोनॉमी (वृत्ताकार अर्थव्यवस्था) को अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें कचरे को संसाधन में परिवर्तित किया जा सके।


स्वच्छ भारत अभियान का सबसे बड़ा योगदान शौचालयों का निर्माण और खुले में शौच को कम करना रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में करोड़ों शौचालय बने हैं और कई राज्यों को ओपन डिफेकेशन फ्री घोषित किया गया है। शहरी क्षेत्रों में भी डोर-टू-डोर कलेक्शन और सफाई में सुधार हुआ है। लेकिन ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति अलग है। अभियान का प्रारंभिक ध्यान शौचालयों और दिखावटी स्वच्छता पर था। कचरे को स्रोत पर अलग करना, प्रोसेस करना और लैंडफिल में कम भेजना, ये चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं।


कई स्थानों पर अपशिष्ट प्रबंधन केंद्र स्थापित किए गए हैं, लेकिन रखरखाव और संचालन की कमी के कारण वे बेकार पड़े हैं। सोर्स सेग्रीगेशन का दावा अधिक है, लेकिन वास्तविकता में मिश्रित कचरा ही पहुंचता है। इससे प्रोसेसिंग प्लांट्स की क्षमता प्रभावित होती है और लैंडफिल पर बोझ बना रहता है। नगरपालिकाओं में कर्मचारियों, धन और तकनीकी क्षमता की कमी भी एक बड़ा कारण है। जागरूकता की कमी के चलते व्यवहार में बदलाव धीमा रहा है, लोग कचरा अलग नहीं करते या खुले में फेंक देते हैं। सत्यापन की कमी के कारण ओडीएफ प्लस जैसी उपलब्धियाँ भी पूरी तरह टिकाऊ नहीं हो पाई हैं।


यहाँ सर्कुलर इकोनॉमी का महत्व सामने आता है। यह मॉडल कचरे को न्यूनतम करने या समाप्त करने पर जोर देता है। रिड्यूस, रियूज, रिसाइकिल और रिकवर इसके मुख्य सिद्धांत हैं। भारत में ठोस अपशिष्ट का एक बड़ा हिस्सा जैविक है, जिसे खाद या बायोगैस में बदला जा सकता है। प्लास्टिक, ई-कचरा, बैटरी और अन्य सामग्री को रीसाइक्लिंग के माध्यम से आर्थिक चक्र में वापस लाया जा सकता है। इससे लैंडफिल का दबाव कम होगा, प्रदूषण घटेगा, रोजगार बढ़ेंगे और आयात पर निर्भरता भी कम हो सकती है।


सरकार ने प्लास्टिक, ई-कचरा, बैटरी, टायर आदि के लिए नियम बनाए हैं और विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी (ईपीआर) लागू की है। इसके तहत उत्पादकों को अपने उत्पादों के जीवनकाल के अंत में जिम्मेदारी लेनी होती है। कई लाख टन कचरा प्रोसेस भी हो चुका है, लेकिन अभी भी स्रोत पर पृथक्करण, रीसाइक्लिंग क्षमता और अनौपचारिक क्षेत्र के एकीकरण में बड़ी कमी है।


समस्या का मूल कारण सिस्टम की कमजोरी है। कचरा अलग न होने से रीसाइक्लिंग महंगी और कठिन हो जाती है। अनौपचारिक कबाड़ी और कचरा उठाने वाले महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन उन्हें औपचारिक सिस्टम में शामिल करने की व्यवस्था अपर्याप्त है। नगरपालिकाएं अक्सर बड़े प्लांट्स पर निर्भर रहती हैं, जबकि विकेंद्रीकृत समाधान, जैसे सामुदायिक कंपोस्टिंग अधिक प्रभावी हो सकते हैं। निगरानी और प्रवर्तन भी कमजोर है। नागरिकों को जागरूक करने के प्रयास हुए हैं, लेकिन निरंतरता और जवाबदेही की कमी रही है। 'स्वच्छ भारत अभियान' ने कुछ हद तक जागरूकता पैदा की, लेकिन टिकाऊ आदतें और बुनियादी ढांचा दोनों अधूरे रहे हैं।


आगे का रास्ता स्पष्ट है। सबसे पहले स्रोत पर कचरा पृथक्करण को अनिवार्य और व्यावहारिक बनाना होगा। इसके लिए नगरपालिकाओं को अलग-अलग वाहन और प्रोसेसिंग सुविधाएं देनी होंगी। ईपीआर को और सख्ती से लागू किया जाए और उत्पादकों-रीसाइक्लर्स के बीच समन्वय बेहतर हो। जैविक कचरे के लिए गोबरधन जैसी योजनाओं को विस्तार देना चाहिए। अनौपचारिक क्षेत्र को प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण और उचित मूल्य देकर औपचारिक बनाया जाए। स्कूलों, आवासीय समितियों और सार्वजनिक अभियानों के जरिए नागरिकों की भागीदारी भी बढ़ाई जाए।


इस प्रकार, नागरिकों में स्रोत पर कचरा अलग करने की आदत अभी भी कमजोर है। जब घरेलू स्तर पर ही गीला और सूखा कचरा मिला रहता है, तो रीसाइक्लिंग और कंपोस्टिंग दोनों मुश्किल हो जाते हैं। इसके साथ ही, नगरपालिकाओं की क्षमता बढ़ाने के लिए फंडिंग, स्टाफ और तकनीकी सहायता जरूरी है। लीगेसी डंपसाइट्स की सफाई जारी रखनी होगी, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि नया कचरा वहां न पहुंचे।


सर्कुलर इकोनॉमी केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक अवसर भी प्रदान करती है। यह रोजगार पैदा करती है, संसाधनों की बचत करती है और स्वास्थ्य में सुधार लाती है। सर्कुलर इकोनॉमी तभी सफल होगी जब हम कचरे को केवल साफ करने का साधन न मानें, बल्कि उसे आर्थिक मूल्य वाला संसाधन बनाएं। प्लास्टिक, ई-कचरा और जैविक कचरे से रोजगार और आय उत्पन्न हो सकती है, लेकिन इसके लिए अनौपचारिक क्षेत्र को सम्मानजनक तरीके से जोड़ना और उत्पादकों पर ईपीआर को सख्ती से लागू करना आवश्यक है। यदि 'स्वच्छ भारत अभियान' ने नींव रखी, तो अब उस नींव पर वृत्ताकार मॉडल खड़ा करना होगा।


इस अभियान के अनुभवों से सीख लेकर विकेंद्रीकृत समाधानों और नागरिक जिम्मेदारी को मजबूत किया जाए, तो कचरा प्रबंधन टिकाऊ और लाभकारी बन सकता है। जनहित की दृष्टि से यह आवश्यक है कि सरकार, उद्योग, नगरपालिका और नागरिक मिलकर काम करें। जब तक कचरा 'कचरा' माना जाएगा, समस्या बनी रहेगी। जब उसे संसाधन माना जाएगा, तभी असली स्वच्छता और टिकाऊ विकास संभव होगा। समय आ गया है कि हम इस दिशा में ठोस और निरंतर कदम उठाएं।