भारत में जनगणना और सर्वेक्षणों में देरी: नीति निर्माण पर प्रभाव
नीति निर्माण में आंकड़ों की भूमिका
देश में जनगणना, अपराध डेटा, और परिवारों की आय, स्वास्थ्य और शिक्षा से संबंधित सर्वेक्षणों का उद्देश्य नीति निर्माण में सहायता करना है। जनगणना के दौरान न केवल जनसंख्या की गिनती की जाती है, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर और सुविधाओं का भी आकलन किया जाता है। सालाना रिकॉर्ड के माध्यम से अपराध, स्वास्थ्य और अन्य क्षेत्रों की स्थिति का मूल्यांकन किया जाता है, जिससे नीतियों का निर्माण होता है। हाल ही में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े जारी किए गए हैं, लेकिन ये आंकड़े डिजिटल युग में भी कम से कम दो साल पुराने हैं। इस स्थिति में यह सवाल उठता है कि इतनी पुरानी जानकारी के आधार पर नीतियां कैसे बनाई जा सकती हैं?
जनगणना में देरी
भारत में जनगणना आमतौर पर हर 10 साल में होती है, लेकिन अंतिम जनगणना 2011 में हुई थी। वर्तमान में जनगणना चल रही है, जो कोरोना महामारी के कारण 5 साल की देरी से हो रही है। इसके परिणामस्वरूप, नई नीतियां भी पुरानी डेटा पर आधारित होंगी। तेजी से बदलते भारत में, जनसंख्या और डेमोग्राफी में हो रहे परिवर्तनों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि जो नीतियां बनाई जाएंगी, वे समय के साथ अप्रचलित हो जाएंगी।
NCRB रिपोर्ट की पुरानी जानकारी
हाल ही में जारी NCRB रिपोर्ट में सभी राज्यों की पुलिस द्वारा अपराध की घटनाओं का विवरण दिया गया है। यह रिपोर्ट 2026 में आई थी, जिसमें 2024 का डेटा शामिल है। जबकि पश्चिमी देशों में, अपराध से संबंधित डेटा अधिकतम 6 महीने में सार्वजनिक किया जाता है, भारत में यह प्रक्रिया काफी धीमी है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की स्थिति
भारत का स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय समय-समय पर नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे करता है। हाल ही में जारी रिपोर्ट में भी कम से कम डेढ़ साल का अंतर है। इस सर्वे में विभिन्न सामाजिक और आर्थिक कारकों का डेटा इकट्ठा किया जाता है, जो समय के साथ बदल सकते हैं।
अन्य रिपोर्टों में भी देरी
कृषि मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट भी एक साल की देरी से आती है। हालांकि, कुछ रिपोर्ट जैसे UDISE+ समय पर आती हैं, जो नीतिगत निर्णय लेने में मदद करती हैं।
जनगणना और सामाजिक योजनाओं पर प्रभाव
जनगणना के डेटा पर खाद्य सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं निर्भर करती हैं। इसके चलते कई लोग लाभ से वंचित रह जाते हैं। इसके अलावा, आरक्षण का निर्धारण भी जनगणना के आंकड़ों पर आधारित होता है।
पश्चिमी देशों की तुलना
भारत की जनसंख्या और सामाजिक संवेदनशीलता के बावजूद, पश्चिमी देशों में सर्वेक्षण और जनगणना की प्रक्रिया नियमित रूप से होती है। भारत में जनगणना की प्रक्रिया में देरी से नीतियों की प्रासंगिकता पर सवाल उठते हैं।