भारत में नक्सलवाद का अंत: एक ऐतिहासिक उपलब्धि
नक्सलवाद का इतिहास
भारत पिछले छह दशकों से वामपंथी उग्रवाद का केंद्र रहा है। यह आंदोलन 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ, जिसे 'नक्सलवाद' के नाम से जाना जाता है। चारू मजूमदार, कानून सान्याल और जंगल संथाल ने भूमिहीन किसानों और आदिवासियों के बीच नफरत की आग भड़काई, जिससे यह आंदोलन देश के 12 से अधिक राज्यों में फैल गया और सैकड़ों जवानों और नागरिकों की जानें गईं। केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 को आधिकारिक रूप से नक्सलवाद के अंत की घोषणा की।
नक्सलवाद का अंत कैसे हुआ?
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में सरकार ने नक्सलवाद को समाप्त करने का संकल्प लिया। नक्सलियों का प्रभाव 12 राज्यों के 200 से अधिक जिलों में फैला हुआ था, जिसे रेड कॉरिडोर कहा जाता था। सरकार ने इन क्षेत्रों में सड़कें बनाने पर जोर दिया ताकि सुरक्षाबलों की पहुंच बढ़ सके।
नक्सलवाद का सबसे हिंसक दौर
नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में हुई थी, और 2004 से 2014 का दशक इसके इतिहास का सबसे हिंसक समय था। 2010 में 1,936 हिंसक घटनाएं हुईं, जिसमें 720 नागरिकों की जान गई। उस समय कोई एकीकृत राष्ट्रीय नीति नहीं थी, और विभिन्न राज्यों ने अपने तरीके से काम किया।
सरकार के खर्च और प्रयास
गृह मंत्रालय के अनुसार, 2015 में नक्सलवाद से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाई गई। इस योजना के तहत सरकार ने 9,855.20 करोड़ रुपये खर्च किए। इसमें विशेष बुनियादी ढांचा योजना, सुरक्षा संबंधी व्यय और विशेष केंद्रीय सहायता शामिल थी।
नक्सलवाद का अंत: हथियार नहीं, बल्कि पुनर्वास
सरकार ने नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए पुनर्वास की योजनाएं बनाई। समर्पण करने वाले नक्सलियों को आर्थिक सहायता और अन्य लाभ दिए गए। 2025 में 2,337 नक्सलियों ने हथियार डाले।
आदिवासियों के लिए क्या किया गया?
नक्सलवाद के अंत का उद्देश्य केवल नक्सलियों को हराना नहीं था, बल्कि आदिवासियों को भी विकास की मुख्यधारा में लाना था। सड़क संपर्क योजना के तहत 15,189 किलोमीटर सड़कें बनाई गईं और 9,497 मोबाइल टावर लगाए गए।
नक्सलवाद की वर्तमान स्थिति
नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 थी, जो अब शून्य हो गई है। 2010 में नक्सलवाद के कारण 1,936 घटनाएं हुई थीं, जबकि 2026 में यह संख्या घटकर केवल 33 रह गई।
नक्सलियों का समर्पण
28 जुलाई 2026 को 'नई दिशा, नई पहल' अभियान के तहत 16 सक्रिय माओवादियों ने समर्पण किया। इसके बाद 29 जुलाई को 8 माओवादियों ने भी समर्पण किया, जिनमें से एक प्रमुख माओवादी नेता था।