भारत में प्रतिबंधित फिल्म 'द वॉइस ऑफ हिंद रजब' की कहानी
भारत और इजराइल के रिश्तों पर प्रभाव
द वॉइस ऑफ हिंद रजब एक ऐसी फिल्म है जो केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक मुद्दों को उजागर करती है। जब यह फिल्म भारत में रिलीज होने वाली थी, तब इसे रोक दिया गया, जिससे भारत और इजराइल के बीच के रिश्तों पर सवाल उठने लगे हैं।
फिल्म को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब इसे 98वें ऑस्कर अवार्ड में नामांकित किया गया। कौथर बेन हानिया द्वारा निर्देशित इस फिल्म को मार्च में भारत में प्रदर्शित किया जाना था, लेकिन सेंसर बोर्ड ने इसे रोक दिया। कहा जा रहा है कि फिल्म का विषय संवेदनशील है और इससे भारत-इजराइल संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
सेंसर बोर्ड का निर्णय
फिल्म के वितरक मनोज नंदवाना ने बताया कि फिल्म को सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन में भेजा गया था। बोर्ड ने इसमें कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं पाई, लेकिन इसे संवेदनशील मानते हुए मंजूरी नहीं दी।
उन्होंने कहा कि फिल्म में न तो हिंसा है, न ही अश्लीलता, और न ही कोई राजनीतिक संवाद। इसके बावजूद, भारत-इजराइल संबंधों को ध्यान में रखते हुए इसे अनुमति नहीं दी गई।
सच्ची घटना पर आधारित कहानी
यह फिल्म गाजा की एक छोटी बच्ची की सच्ची कहानी पर आधारित है, जो युद्ध और हिंसा के बीच फंस जाती है। फिल्म में उसकी पीड़ा और मदद की प्रतीक्षा को भावनात्मक रूप से दर्शाया गया है।
इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में सराहा गया है और कई पुरस्कार भी मिले हैं। भारत में रिलीज रुकने के बाद यह और अधिक चर्चा में आ गई है।
फिल्म का प्रीमियर और प्रशंसा
इसका प्रीमियर पिछले साल वेनिस फिल्म फेस्टिवल में हुआ था, जहां दर्शकों ने इसे 23 मिनट तक खड़े होकर सराहा। बाद में इसे सिल्वर लायन ग्रैंड जूरी अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।
फिल्म में एक छोटी बच्ची हिंद रजब की कहानी दिखाई गई है, जो गाजा में एक हमले के दौरान अपने परिवार के सदस्यों के शवों के बीच फंसी हुई थी।
आॅस्कर में नामांकन
फिल्म को ऑस्कर में बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म की श्रेणी में नामांकित किया गया था। रिपोर्ट्स के अनुसार, कार पर सैकड़ों गोलियां चलाई गईं और उसे बचाने आए पैरामेडिक्स की भी जान चली गई।