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भारत में शिशु पोषण की चिंताजनक स्थिति: आंकड़े बताते हैं गंभीर कुपोषण

भारत में शिशु पोषण की स्थिति गंभीर है, जहां नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 के आंकड़े बताते हैं कि 6 से 23 महीने के केवल 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिल रहा है। कुपोषण की समस्या अब भी एक-तिहाई बच्चों में देखी जा रही है। हालांकि, कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं, जैसे पूर्ण टीकाकरण की दर में वृद्धि। जानें इस मुद्दे पर और क्या किया जा रहा है और क्या सुधार की आवश्यकता है।
 

भारत में शिशु पोषण की स्थिति

हालांकि भारत में अस्पतालों में प्रसव की संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन शिशु पोषण की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 के आंकड़ों के अनुसार, देश में पोषण से संबंधित विभिन्न योजनाओं के बावजूद, एक बड़ा हिस्सा पोषण से वंचित है। रिपोर्ट के अनुसार, 6 से 23 महीने के केवल 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही न्यूनतम आवश्यक आहार मिल रहा है.


कुपोषण की गंभीरता

यह स्थिति तब है जब आंगनबाड़ी और पोषण 2.0 जैसी योजनाओं पर केंद्र और राज्य सरकारें हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही हैं। देश के 84.7 प्रतिशत बच्चे पोषक आहार से वंचित हैं और कुपोषित हैं। नए आंकड़े बताते हैं कि छह महीने से कम उम्र के शिशुओं में केवल स्तनपान की दर पिछले चार वर्षों में तेजी से गिरी है। 2021-22 में यह दर 63.7 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 55.8 प्रतिशत रह गई है, जो लगभग आठ प्रतिशत की कमी दर्शाती है.


कुपोषण के प्रभाव

लगातार कुपोषण की समस्या अब भी लगभग एक-तिहाई बच्चों में देखी जा रही है। देश में लगभग 67.2 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें उचित आहार नहीं मिल रहा है और वे अपनी उम्र के अनुसार कम वजन के हैं। यह आंकड़े 5 साल तक के बच्चों के लिए हैं, जिनमें से केवल 31.8 प्रतिशत को पोषण मिल पाता है.


कुपोषण से संबंधित बीमारियों का प्रभाव

सही पोषण की कमी के कारण बच्चों में पतले होने की समस्या भी बनी हुई है। 6-23 महीने के बच्चों में पर्याप्त आहार पाने वाले बच्चों की दर केवल 15.3 प्रतिशत है। 5 साल से कम उम्र के 35.5 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जिनका कद उम्र के अनुसार कम है, जो 2019-21 में 29.3 प्रतिशत था.


डॉ. शाहिद अख्तर का बयान

डॉ. शाहिद अख्तर, पेडिट्रिशियन, आयशा हेल्थ केयर
बच्चों को 5 साल तक सही पोषण न मिले तो उनका विकास रुक जाता है। शरीर कमजोर हो जाता है, कद नहीं बढ़ता, वजन नहीं बढ़ता। बार-बार बीमार पड़ते हैं। दिमाग का विकास धीमा हो जाता है, कुछ मामलों में बच्चे हाइपर एक्टिव होने लगते हैं। ज्यादा गंभीर कुपोषण हो तो बच्चा सुस्त, चिड़चिड़ा और कमजोर रहता है। आगे चलकर बीमारियां और बढ़ जाती हैं। 5 साल तक संतुलित भोजन, दूध और फल-सब्जी बहुत जरूरी है।


सर्वे में सकारात्मक पहलू

हालांकि सर्वे में कुछ सकारात्मक बातें भी सामने आई हैं। पूर्ण टीकाकरण की दर 76.6 प्रतिशत से बढ़कर 82.6 प्रतिशत हो गई है। गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में जांच कराने वाली माताओं की संख्या में भी वृद्धि हुई है, और आयरन-फोलिक एसिड की गोली लेने में सुधार हुआ है.


सरकार की पोषण योजनाएं

केंद्र सरकार ने 2025-26 के केंद्रीय बजट में पोषण योजना पर 12,750 करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा है। यह 2024-25 के संशोधित अनुमान 10,600 करोड़ से लगभग 20 प्रतिशत अधिक है. पीएम पोषण योजना, जिसे पहले मिड डे मील योजना के नाम से जाना जाता था, का उद्देश्य स्कूलों में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है.


राज्य स्तर पर योजनाएं

राज्य सरकारें इन केंद्रीय योजनाओं को अपने-अपने राज्यों में लागू करती हैं। यूपी में 'मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना' के तहत प्रभावित बच्चों को पोषण सहायता दी जाती है, जबकि मध्य प्रदेश में 'मुख्यमंत्री बाल आरोग्य संवर्धन कार्यक्रम' के माध्यम से अति कुपोषित बच्चों की विशेष देखभाल की जाती है.


सवाल

पोषण की विभिन्न योजनाओं के बावजूद, केवल 31.8 प्रतिशत बच्चों को ही सही पोषण मिल पा रहा है, जबकि इन योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं.