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भारतीय छात्र राजनीति में वामपंथ का घटता प्रभाव

भारतीय राजनीति में वामपंथ की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, लेकिन हाल के वर्षों में इसके संगठनों को कई झटके लगे हैं। दिल्ली और पंजाब विश्वविद्यालयों में हालिया छात्रसंघ चुनावों के परिणाम वामपंथ के कमजोर होते प्रभाव को दर्शाते हैं। जबकि JNU में वामपंथ का एक गढ़ बना हुआ है, ABVP जैसी संगठन वहां भी चुनौती पेश कर रहे हैं। जानें इस बदलाव के पीछे के कारण और छात्र राजनीति में वामपंथ की वर्तमान स्थिति के बारे में।
 

भारतीय राजनीति में वामपंथ का संकट

भारतीय राजनीति में वामपंथ की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, लेकिन इस वर्ष वामपंथी संगठनों को कई बड़े झटके लगे हैं। पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों में लंबे समय तक शासन करने वाले वामपंथी दल अब किसी भी राज्य में सत्ता में नहीं हैं। इसके अलावा, छात्र राजनीति में भी वामपंथ का प्रभाव कम होता जा रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में वामपंथ का एकतरफा वर्चस्व रहा है, जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और पंजाब यूनिवर्सिटी (PU) जैसे संस्थानों में भी वामपंथ कमजोर होता जा रहा है।


छात्रसंघ चुनावों के परिणाम

हाल ही में दिल्ली और पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनावों के परिणाम एक दिलचस्प तस्वीर पेश कर रहे हैं। इन दोनों विश्वविद्यालयों में वामपंथी संगठनों का चुनावी आधार कमजोर होता दिखाई दे रहा है। JNU में वामपंथ अब भी मजबूत है, लेकिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने पिछले कुछ वर्षों में वहां भी वामपंथ के दबदबे को कम कर दिया है। ABVP जैसे संगठन खुलकर वामपंथी संगठनों को समाप्त करने की बात कर रहे हैं।


पंजाब यूनिवर्सिटी की स्थिति

पंजाब यूनिवर्सिटी में वामपंथी छात्र संगठनों का काफी प्रभाव रहा है। 2018 में हुए छात्रसंघ चुनाव में स्टूडेंट फॉर सोसाइटी (SFS) की कनुप्रिया ने अध्यक्ष पद जीता था, जो इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला बनीं। लेकिन अब वामपंथी संगठन हाशिए पर चले गए हैं। 2026 के PUCSC चुनाव में SFI, SFS और PSU ललकार जैसे संगठन मैदान में नहीं थे। वामपंथ की तरफ से केवल AISA चुनाव में उतरी, जबकि अन्य संगठन चुनावी मैदान से गायब रहे।


दिल्ली यूनिवर्सिटी में ABVP का प्रभुत्व

दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्थिति पंजाब यूनिवर्सिटी से भी स्पष्ट है। 2026 के DUSU चुनाव में ABVP ने चार में से तीन केंद्रीय पद जीते। यश डबास अध्यक्ष बने, जबकि उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने जीत हासिल की। NSUI को इस चुनाव में कोई सफलता नहीं मिली। वामपंथी AISA-SFI गठबंधन भी कोई केंद्रीय पद नहीं जीत सका।


JNU में वामपंथ का गढ़

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जो देश की प्रमुख यूनिवर्सिटी है, पिछले कुछ वर्षों में कई विवादों में रही है। यहां लंबे समय से वामपंथी संगठनों का वर्चस्व रहा है। 2025 के JNUSU चुनाव में AISA-SFI-DSF के गठबंधन ने चारों केंद्रीय पदों पर जीत दर्ज की। हालांकि, ABVP यहां भी वामपंथी संगठनों को कड़ी चुनौती दे रही है।


वामपंथ की चुनौतियाँ

मुख्यधारा की राजनीति के साथ-साथ छात्र राजनीति में भी वामपंथ को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अब JNU ही वामपंथ का एकमात्र गढ़ रह गया है, लेकिन यहां भी ABVP की चुनौती बढ़ती जा रही है। पंजाब यूनिवर्सिटी से दिल्ली यूनिवर्सिटी तक वामपंथ लगातार कमजोर हो रहा है।