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भारतीय नौसेना की क्षमता में वृद्धि के लिए नया अनुबंध

भारतीय नौसेना ने अपनी परिचालन क्षमता को बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय के साथ 449 करोड़ रुपये का अनुबंध किया है। इस समझौते के तहत, नौसेना को 20 स्वदेशी जैमर मिलेंगे, जो दुश्मन के सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम को प्रभावित करने में सक्षम होंगे। यह कदम आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान को भी मजबूती प्रदान करेगा। जानें इस अनुबंध के पीछे की तकनीकी जानकारी और इसके संभावित लाभ।
 

नई दिल्ली में रक्षा मंत्रालय का महत्वपूर्ण कदम

नई दिल्ली: भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता को और अधिक सशक्त बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। मंत्रालय ने बेंगलुरु स्थित एकॉर्ड सॉफ्टवेयर एंड सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ 449 करोड़ रुपये का एक अनुबंध किया है। इस समझौते के तहत नौसेना को 20 एनहैंस्ड कैपेबिलिटी ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम जैमर प्रदान किए जाएंगे, जो पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित हैं।


नौसेना को मिलेगी नई इलेक्ट्रॉनिक ताकत

यह अनुबंध 'बाय इंडियन-आईडीडीएम' श्रेणी के अंतर्गत किया गया है, जिसका उद्देश्य देश में विकसित और निर्मित रक्षा उपकरणों को बढ़ावा देना है। ईसीजीएनएसएस जैमर आधुनिक युद्धक्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि ये दुश्मन के सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं। इससे विरोधी पक्ष के जहाज, ड्रोन और अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म की दिशा और लक्ष्य निर्धारण क्षमता कमजोर हो सकती है। नौसेना के लिए यह तकनीक समुद्री अभियानों में अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करेगी।


कैसे काम करेंगे ये अत्याधुनिक जैमर

ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम में जीपीएस, ग्लोनास, गैलीलियो और बेइदौ जैसे नेविगेशन नेटवर्क शामिल हैं। नए जैमर इन सिग्नलों को बाधित करने, कमजोर करने या भ्रमित करने की क्षमता रखते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रणाली सिग्नल स्पूफिंग जैसी तकनीकों का उपयोग कर दुश्मन को गलत जानकारी भी दे सकती है। इससे आधुनिक हथियार प्रणालियों और ड्रोन आधारित खतरों का प्रभाव कम किया जा सकता है, जो वर्तमान युद्ध परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


आत्मनिर्भर भारत को मिलेगा बल

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि यह सौदा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान को नई मजबूती प्रदान करेगा। अनुबंध में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया जाएगा। इससे देश में रक्षा तकनीक के विकास, रोजगार सृजन और औद्योगिक क्षमता को बढ़ावा मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी प्रणालियां थलसेना और वायुसेना के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती हैं, जिससे भारत की समग्र रक्षा तैयारियां और मजबूत होंगी।