भारतीय रुपया गिरकर 94.93 प्रति डॉलर पर पहुंचा, आर्थिक चिंताएं बढ़ीं
रुपये में ऐतिहासिक गिरावट
रुपया बनाम डॉलर: पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच, भारतीय रुपया शुक्रवार को 94.93 प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निम्न स्तर पर पहुंच गया। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में, रुपया 94.18 पर खुला, लेकिन दिनभर के दबाव के बाद यह और गिरकर रिकॉर्ड स्तर पर बंद हुआ। इससे पहले, यह 93.96 के स्तर तक गिर चुका था, जो उस समय का सबसे निचला स्तर था।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने रुपये में आई इस गिरावट को लेकर केंद्र सरकार पर हमला किया है। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक पुराना वीडियो साझा करते हुए मौजूदा स्थिति पर सवाल उठाए और सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की।
पार्टी का कहना है कि रुपये की कमजोरी देश की आर्थिक स्थिति और नीति प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करती है। वहीं, सरकार ऐसे मामलों में आमतौर पर वैश्विक कारणों जैसे कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक तनाव को जिम्मेदार ठहराती है।
गिरावट के कारण
रुपये में रिकॉर्ड गिरावट: इस गिरावट का मुख्य कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली, डॉलर की मजबूती और पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव को माना जा रहा है। वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती भी रुपये पर दबाव बना रही है, जहां डॉलर इंडेक्स छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले बढ़त में बना हुआ है।
घरेलू शेयर बाजारों में भी इस अस्थिरता का असर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। BSE Sensex 1,690 अंक यानी 2.2 प्रतिशत गिरकर 73,583 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि Nifty 50 में भी लगभग 487 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। बाजार में यह कमजोरी विदेशी निवेशकों की निकासी और वैश्विक अनिश्चितता के कारण देखने को मिली। भारी बिकवाली के कारण निवेशकों के लगभग 8.5 लाख करोड़ रुपये डूब गए।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिति
शेयर बाजार में गिरावट: अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude Oil की कीमतें बढ़कर लगभग 109.8 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जिससे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें न केवल महंगाई को बढ़ाती हैं, बल्कि चालू खाता घाटा और मुद्रा पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती हैं।
यह ध्यान देने योग्य है कि जब भी भारतीय रुपया कमजोर होता है, इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, खासकर कच्चा तेल, जिससे पेट्रोल-डीजल और रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं। इससे सरकार का राजकोषीय घाटा भी बढ़ता है, क्योंकि सब्सिडी और आयात बिल दोनों पर दबाव आता है। इसके अलावा, विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए खर्च बढ़ जाता है, क्योंकि उन्हें डॉलर में अधिक भुगतान करना पड़ता है।
निर्यातकों के लिए संभावनाएं
हालांकि, रुपये में गिरावट का एक सकारात्मक पहलू भी है। इससे निर्यातकों को लाभ होता है, क्योंकि उन्हें US Dollar में भुगतान मिलता है और कमजोर रुपये के कारण उन्हें अधिक रुपये मिलते हैं। इससे आईटी, फार्मा और टेक्सटाइल जैसे निर्यात-आधारित क्षेत्रों को बढ़ावा मिल सकता है। यानी, जब तक पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक रुपये पर दबाव बने रहने की आशंका जताई जा रही है।