भारतीय शिक्षा दृष्टि: ज्ञान के साथ संस्कार और नैतिक मूल्यों का विकास
भारतीय शिक्षा दृष्टि पर विचार-विमर्श
जालंधर: डीएवी विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम में 'भारतीय शिक्षा दृष्टि' पर एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर श्री देशराज, राष्ट्रीय महामंत्री, विद्या भारती ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा दृष्टि ज्ञान, कौशल और संस्कृति के संतुलन पर आधारित है, जो छात्रों को मकाले की मानसिकता से बाहर निकालती है।
उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय शिक्षा केवल रोजगार पर केंद्रित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला सिखाती है। यह शिक्षा देश की संस्कृति, प्रकृति, प्रगति और परिवर्तन का आधार है, और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। श्री देशराज ने बताया कि भारतीय शिक्षा दर्शन 'पंचकोष' पर आधारित है, जिसमें शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा का संतुलित विकास शामिल है।
उन्होंने आगे कहा कि 'भारतीय शिक्षा दृष्टि' का मुख्य उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों में संस्कार, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रहित की भावना का विकास करना भी है। यह दृष्टिकोण नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप है, जो रटने के बजाय कौशल, मूल्य और समग्र विकास पर जोर देती है। इसका लक्ष्य युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते हुए भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है।
कार्यक्रम में नई और पुरानी पीढ़ी के बीच संवाद को आवश्यक बताते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा के माध्यम से समाज के प्रति दायित्व बोध, राष्ट्रीय चरित्र, श्रम के प्रति सम्मान और बुराइयों से दूर रहने की प्रवृत्ति विकसित की जा सकती है। मातृभाषा के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़कर ही एक सशक्त और सभ्य समाज का निर्माण संभव है।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मनोज ने मुख्य अतिथि का स्वागत किया। कार्यक्रम में विद्या भारती पंजाब के कोषाध्यक्ष विजय ठाकुर और प्रांत संपर्क प्रमुख सुखदेव वशिष्ठ सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।