मणिपुर की स्थिति: चुप्पी और नाउम्मीदी का संकट
मणिपुर में बढ़ती नाउम्मीदी
हाल ही में ‘द इकोनॉमिस्ट’ में मणिपुर की स्थिति पर एक रिपोर्ट पढ़ी। इसमें एक वाक्य ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि मणिपुर की अशांति को और भी भयावह बनाने वाला तत्व उसके बाद का सन्नाटा है, जो नाउम्मीदी और निराशा का प्रतीक है। यह एक महत्वपूर्ण और सटीक अवलोकन है। मई 2023 में कुकी और मैतेई समुदायों के बीच हुई हिंसा के बाद, प्रदेश की जनसंख्या दो अलग-अलग हिस्सों में बंट गई है। लगभग पचास हजार लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं, कुकी और मैतेई अलग-अलग। केंद्र सरकार इसे सामान्य मानकर चुप्पी साधे हुए है। पहले भारत के सीमांत क्षेत्रों में हिंसा होती थी, जिसके बाद संवाद और राजनीतिक समझौते होते थे। लेकिन मई 2023 के बाद स्थिति अलग है। सुरक्षा बलों ने संघर्ष को तो रोका, लेकिन मेल-मिलाप की कोई कोशिश नहीं की। इस प्रकार, मणिपुर में बंदूकें खामोश होने के बाद जो चुप्पी छाई है, वह पहले के शोर से कहीं अधिक चिंताजनक है। यह चुप्पी, नाउम्मीदी है, जिसमें भय, शिकायत और घृणा समाहित हैं। इसका अर्थ है कि साझा नागरिक भविष्य और एक साथ रहने का विचार धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है।
सरकार की चुप्पी और अवसरवाद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने सत्ता के चश्मे से देखना शुरू कर दिया है, जिससे भाजपा और उसके नेताओं, मंत्रियों, आरएसएस और समर्थकों को ऐसा अंधा बना दिया है कि उनके सामने सब कुछ हरा-भरा नजर आता है। चाहे लोग प्रदूषण में जीते हों, जहरीला पानी पीते हों, या डोनाल्ड ट्रंप भारत को अपमानित करते हों, संघ परिवार के नेता इसे अमृतकाल मानते हैं।
इस सप्ताह, डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री उन्हें ‘सर, सर’ कहकर खुश रखते हैं, और उनके प्रशासन द्वारा भारत पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की बात—ये सब 140 करोड़ लोगों के देश का अपमान है। लेकिन मोदी सरकार की नीति क्या है? चुप्पी बनाए रखना! कुछ नहीं करना। समय को गुजरने देना। मणिपुर में कुकी बनाम मैतेई के मुद्दे पर भाजपा ने पहले अवसर को भुनाया, सरकार बनाई और संघ परिवार ने ताली बजाई। अब लगभग तीन साल से लोग बंट चुके हैं, लेकिन इसकी चिंता नहीं। राष्ट्रपति शासन लागू है और अब एक साल होने वाला है। इसी तरह, मोदी ने ट्रंप से पहले अवसर को समझा और ‘अबकी बार ट्रंप’ का नारा लगाया। लेकिन फिर अवसरवाद दिखाया, जिससे ट्रंप ने भारत को विश्व राजनीति से अलग कर दिया। विदेश नीति नाउम्मीदी में सांस ले रही है, जैसे मणिपुर के लोग जी रहे हैं।
सामाजिक और आर्थिक संकट
दिल्ली और अन्य महानगरों के प्रदूषण पर ध्यान दें। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके पास कुछ नहीं है। भारत केवल एक बाजार बनकर रह गया है। 80-100 करोड़ नागरिक खैरात और सब्सिडी पर निर्भर हैं, और यह सब संघ परिवार के लिए हरे-भरे विकसित भारत का अमृतकाल है।
इसलिए, विदेश नीति, सेना, अर्थव्यवस्था, शासन, शिक्षा, स्वास्थ्य और अपराध के सभी पहलुओं में नाउम्मीदी व्याप्त है। हिंदू केवल अपनी सरकार के हरे चश्मे से आज जी रहे हैं। सत्ता में आने के बाद मंदिर में भगवान के दर्शन कर लिए, चुनाव जीत लिया, और सत्ता का प्रसाद पा लिया—तो आज अमृतकाल है, कल की चिंता किसे है? यही सौ साल पुरानी हिंदू राजनीति का विचार है। सत्ता आई-गई, तो चश्मा पहने रहो और हरे-भरे भारत का दृश्य देखो। देश की सेहत, दिशा और भविष्य की कोई परवाह नहीं।